मुख्यपृष्ठस्तंभगांव और गबरू के बरुआ का कोहबर

गांव और गबरू के बरुआ का कोहबर

पंकज तिवारी

बियाहे के चहलकदमी में व्यस्त भुलेस्सर कका एक-एक काम पर निगाह गड़ाए हुए थे। दो दिन पहले से ही फूआ, बहिन, पैदल या फिर एक्का चढ़कर आने लगी थीं। गदेलन की भीड़ किसी के आने पर तब तक घेरे खड़ी होती थी जब तक कि कोछ भर लाई, गट्टा खाने को नहीं मिल जाता था। फूआ घर आते ही पूरा गांव घूम आई थीं। मीन-मेख निकालने में भी बहुत आगे थीं फूआ, पर छेकना काकी से एक भी नहीं चलता था। फूआ के साथ गोलू, मोलू, मुनिया भी जरूर आती थीं।
भीड़ से घर भर गया था। खुशनुमा माहौल सभी के चेहरे से टपक-टपक पड़ रहा था। शादी एक घर में होती थी व्यस्त पूरा गांव होता था। अपने-अपने स्तर पर सभी सहयोग भी कर दिया करते थे। कोई दूध, दही, माठा तो कोई लूगा-लगदी से बना सुंदर-सुंदर सुजनी ही दे दिया करता था। खटिया, तक्था तो महीनों पड़े रहते थे। गीत-गवनई सभी को खूब सोहाती थी। झूलन ददा तो सभी को बुला-बुला कर जबरदस्ती गवाते थे। ‘बिना गवनई मोका के मतलबइ नहीं है’ ये उनका तकिया कलाम हुआ करता था।

अंगने में लेड़हरा का लच्छा बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत कर रहा होता था। तुलसी पूरे घर की शोभा होती थी। पूजा-पाठ से घर सदा गमगमाता रहता था। शाम होते ही कउड़ा बर जाता था। उधर ओसारे में पुअरा से बना गोनरा बिछाकर लोग वहीं डेरा डाल लिए थे। बुढ़िया माई गदेलन के साथ रजाई में गोड़ डालकर किस्सा-कहानी कहने में मस्त थी। रजाई से बाहर निकलने की हिम्मत किसी में नहीं थी, पर काम पड़ने पर निकलना ही पड़ता था। रसोइयां में चूल्हे पर बन रहे खाने से पूरी रसोइयां काली दिखाई देने लगी थी। रात के ग्यारह बजे तक मम्मी, चाची लोग काम में ही लगी रहा करती थीं। रात को अंधेरे बीच आंगन में निकलना भी बड़ी बहादुरी का काम होता था, झैं छूटता था।
सबेरे-सबेरे मंडली खुर्पी, फर्सा, झौआ लिए दूब नोचने और सफाई करने में जुट गई थी। खपड़ैला पर के कचरे को भी साफ किया जा रहा था। घाम साफ चमक रहा था। कौरा के चक्कर में कौआ भी इधर-उधर घुमर रहा था।

आज गबरू का बरुआ था। बार मुंडवाने के बाद ही बरुआ की प्रथा थी, पर गबरू को लगा कि बार बनते ही हमारी सुंदरता उड़न छू हो जाएगी। अत: उसने मना कर दिया।
‘बप्पा रे बप्पा एतना मनमानी अबइ तक कवनउ गदेला नाइ किहेऽ रहेन रे, ईऽ तऽ अनर्गल हौ रे बप्पा। कहां हए रेऽ भुलेसरा’, फूआ दौड़ते हुए लकड़ी लगाने अपने भैया के पास पहुंच गई थीं।

पूरी बात सुनते ही पूरे जोश में भूलेस्सर टूट पड़े गबरू पर- ‘जादा मनमानी करबऽ तऽ बियहवइ नहियाइ देब, कुलि मस्ती भुलाइ जाब्याऽऽऽ…’
बेचारे गबरू ने इतने बड़े शस्त्र के आगे हार मान ली। बियाह होना उसके लिए उसका जनम बन जाने के बराबर था। बियाह के उपलक्ष्य में हुए सुंदरकांड में उसने यही संपुट रखवाया था- ‘प्रभु की कृपा भयहु सब काजू, जनम हमार सुफल भा आजू’।
मुंडा मूड़ हो जाने के बाद गबरू बरुआ पर बैठ गया था। पंडित जी बरुआ कराने लगे थे। माड़उ में बरुआ और सिलपोहना के कार्यक्रम से भुलेस्सर कका और काकी खूब गदगद थीं। भीख देने गांव वाले भी आने लगे थे। बरुआ का गीत गाया जाने लगा था-
‘नदिया के तीरे-तीरे
बरुआ फिरै, केउ पार उतारै
अरे बाबा हो कवन राम
पठइ देउ नावढ़ि
ना मोरे नाव-नवढ़िया, ना घर केवट
जेकरे बरुअवा के साध ते पंवड़ि दह उतरंइ’
प्रक्रम पूरा होने के बाद गबरू कोहबर में चला गया जहां दीवार पर चूना तथा गेरुआ से रंगाई के बाद कोहबर लिखा गया था। जमीन पर गोबर से लिपाई के बाद खूब सारी दियली एक साथ जर रही होती थी। कोसा और पूड़ी जोड़ा में रखे होते थे। अंधेरे से कमरे में इतनी सारी सुंदरता देखकर मन मस्त मगन हुए बिना नहीं रह पाया। एक अलग ही लोक में होने का सुख मिलने लगा था‌।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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