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मुंबई की कोली होली

मुंबई की होली के रंग फिल्मों में आपने देखे होंगे। पर मुंबई की सबसे स्पेशल होली है ‘कोली होली’, यानी मुंबई के मूल निवासी कोली मछुआरों की होली।

विमल मिश्र। वर्ली किले की ओर जाते हुए भारतीय कोस्ट गार्ड मुख्यालय के पास गोलफा देवी मार्ग पर गोलफा देवी का ७०० वर्ष पुराना मंदिर है, जहां गोलफा देवी अपनी बहनों साखबा देवी और हरबा देवी के साथ विराजमान हैं। मुंबई के मछुआरे मछली पकड़ने के लिए समुद्र में निकलने सहित कोई काम देवी के आदेश के बिना नहीं करते। होली के सबसे चटख रंग मुंबई के कोली-मछुआरों की कुलदेवी के इस मंदिर में दिखते हैं। मुंबादेवी और शहर के कई अन्य देवी मंदिरों में भी मुंबई के ये मौलिक निवासी होली वंदन के लिए विशेष हाजिरी लगाते हैं।
मुंबई की मछुआरा बस्तियों में होली नारियल पूर्णिमा के साथ सबसे धूमधाम से मनाया जानेवाला उत्सव है, जब सभी वर्जनाओं को तिलांजलि देकर लोग अबीर-गुलाल से सराबोर, ढोल-ताशों के नाद के साथ मस्ती में डूबे होते हैं। युवा वर्ग यह उत्सव अब लेसर बीम, जगमग फ्लडलाइट और विशालकाय स्पीकर्स के साथ मनाने लगा है, पर बुजुर्ग हो चले लोगों को अभी भी पुराने चाल की होली ही पसंद है।
खार दांडा में यह होलिकोत्सव का सौवां वर्ष है। यहां के हिंदू कोली भाइयों ने कोरोना प्रतिबंधों के बावजूद अपने ईस्ट इंडियन ईसाई भाइयों के साथ मिलकर यह उत्सव मनाने की खास तैयारियां की हैं। खार दांडा में यह उत्सव अन्य मछुआरा बस्तियों में मनाए जानेवाले उत्सव से दो दिन पहले ही मना लिया जाता है, धर्मभावी बुजुर्ग जिसके पीछे होलिका देवी के ‘आदेश’ को कारण बताते हैं। तीन दिन की होली शिमगा फेस्टिवल कमिटी से जुड़े ब्रेंडेन मिरांडा ने हमारी जानकारी में इजाफा किया, ‘तत्कालीन ब्रिटिश सबर्बन कलेक्टर कार्टर पेरी ने १९२२ में इस उत्सव को मंजूरी दी थी, इस लिहाज से यह मुंबई का अधिकृत मान्यता प्राप्त पहला सार्वजनिक पर्व है।’
वर्सोवा, वर्ली, खार दांडा, कफ परेड और वसई सहित मछुआरा बस्तियों में होली पर सुहासिनियां (विवाहित महिलाएं) पान-सुपारी के पेड़ के समक्ष पूजा करती हैं और फिर उसके तने को विधि-विधान से बस्ती में लाया जाता है। देवी स्वरूप मानकर इसे कोली साड़ी पहना और हल्दी का उबटन लगाकर स्नान कराने के बाद फूलों से सज्ज किया जाता है और फिर गोद भरने की रस्म अदा की जाती है। पान, सुपारी, नारियल, कंघा, शीशा, चावल और मेवे एक पीले वस्त्र में रखकर पेड़ के इस तने के साथ बांध दिया जाता है और पूरी बस्ती में शोभायात्रा निकालने के बाद उसे नियत जगह एक गड्ढे में स्थापित कर दिया जाता है। अब उसकी पूजा कर मिष्ठान्न सहित नैवेद्य का भोग लगाया जाता है। अर्धरात्रि के बाद अग्नि प्रज्वलित करने का काम गली के मुखिया के सुपुर्द होता है। अगले दिन जब अग्नि पूरी तरह शांत हो जाती है, तब उसे शोभायात्रा के रूप में समुद्र में जाकर विसर्जित कर दिया जाता है।
रोशनियों और दीयों से सजी-धजी बस्ती में पूरी रात रतजगे की होती है। भस्म तिलक और प्रसाद वितरण के बाद रंग-गुलाल और नृत्य-गीतों का सिलसिला सुबह पांच बजे तक चलता है। अगली सुबह से दोपहर तक हुरियारों की टोलियों द्वारा घर-घर जाकर रंग खेलने का सिलसिला चलता है।
‘कुमार होली’ और ‘गोता होली’
मछुआरों की होलिका को लेकर विशेष मान्यताएं हैं। विशेष चलन है उसकी अग्नि में छिलकेवाला नारियल समर्पित करना और भाले की नोक से उसे निकालना। नए वर्ष में कौन-सी मछली ज्यादा मिलेगी, इसका अंदाज होलिका दहन के समय लकड़ियों के खास दिशा में छिटकने से लगाया जाता है।
मछुआरों की बस्तियों में होली-जो कभी १५ दिन का उत्सव था-आज केवल दो दिनों ‘कुमार होली’ और ‘गोता होली’ में ही सिमटकर रह गई है। फाल्गुन पूर्णिमा का यह पूरा दिन गहमा-गहमी से भरा होता है। नियम है कि होलिका को भेंट करने के लिए कोलीवाड़ा के हर घर से नारियल और लकड़ी व छाल आएगा ही। इसलिए दोपहर से ‘सुरकों’ में सजे बस्ती के युवा मौज-मस्ती करते हुए गाजे-बाजे के साथ एरेंडल और आम की टह‌नियों की तलाश में निकल पड़ते हैं। शाम जैसे ही ढलने को होगी नए ‘लुगड़ों’ में महिलाएं सिर पर मछली की डिजाइन वाले मटके लिए बैंड-बाजे के साथ मंदिरों में दर्शन-पूजा के बाद होलिका दहन स्थल पर आती हैं और उसकी पांच प्रदक्षिणा करती हैं- इस मन्नत के साथ कि उनकी नाव समुद्र से कभी खाली न लौटे। नवविवाहित दंपतियों को इस उत्सव में विशेष मान दिया जाता है।
होली का अगला दिन काम-काज बंद रख नावों की साज-सजावट, रंग-रोगन, रोशनी व पूजा का होता है। नावों को रंग-बिरंगे झंडों से सजाया जाता है और नई साड़ी लहराकर महिलावृंद अगले दिन उसे पहनता है। सजावट की प्रतियोगिताएं होती हैं। मछुआरों के नियमित ग्राहक उन्हें मिठाई व उपहार भेंट करते हैं। मित्र-संबंधियों-खासकर जिनके पास अपनी नावें नहीं हैं- उन्हें बुलाकर भोज दिया जाता है। इस भोज की खास बात होती है सरा (स्थानीय शराब) के साथ माहिम के पाटला हलवा, लपसी और पूरणपोली के साथ शानदार भोज।
देशभक्ति का पर्व
महाराष्ट्र में होली-जो ‘शिमगा’ के नाम से भी जानी जाती है- पांच दिन, रंगपंचमी तक मनाई जाती है। युवक खेतों में घुसकर फल-सब्जी और नई फसल का धान चुराकर खाते हैं और खेतिहर इसका बुरा नहीं मानते। स्थान विशेष को लीप-पोतकर शुद्ध किया जाता है। रंगोली बनाकर लकड़ी-कंडों से उसे प्रज्वलित कर हल्दी-कुंकुम और घी, दही, गन्ना, नारियल और नई फसल के अनाज के साथ घर में बने पकवानों, विशेषकर पूरणपोली का भोग लगाते हैं। आग जब बुझने को होती है, तब उस पर पानी छिड़ककर उसे ठंडा करते हैं और भभूत का टीका सबके माथे पर लगाया जाता है। गांवों में यह फसल कटने के बाद खान-खलिहानों में मनाया जानेवाला त्योहार है- नए संवत्सर का दिन। महाराष्ट्र में होली देशभक्ति का पर्व भी माना जाता है, क्योंकि होली के ही दिन जीजाबाई की सगाई शहाजी के साथ हुई थी। वही जीजाबाई जो छत्रपति शिवाजी महाराज की मां ही नहीं, गुरु भी थीं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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