मुख्यपृष्ठस्तंभ`कोटा' सुसाइड का

`कोटा’ सुसाइड का

डॉ. रवींद्र कुमार
हम अपने बच्चे को वो नहीं बनने देना चाहते जो वो बनना चाहता है। हम बच्चे को वो बनाना चाहते हैं, जो हम उसे बनाना चाहते हैं। मैं इंजीनियर नहीं बन पाया तो क्या? मेरा बेटा/बेटी बनेगी। और दिखा देगी दुनिया को कि शर्मा जी/गुप्ता जी के बच्चे भी किसी से कम नहीं। चाहे उसमें इस लाइन का एप्टीट्यूड है या नहीं उससे क्या?
भले ही अपनी जमीन खेत गिरवीं रखने पड़े या महाजन से औने पौने रेट पर कर्जा लेना पड़े। बस कोटा के सुसाइड्स का यही लब्बोलुआब है। बाकी सब सेंसलैस डिफेंस के असफल प्रयास हैं। हम अपनी संतान को इस रेस में पीछे नहीं रहने देंगे। इंजीनियर बना कर ही मानेंगे। एक ‘मोठा पैकेज’ लेने का ही है उसे।
अपनी बेवकूफियों का अंदाज भी नहीं लगा सकते हम:
१. सीलिंग पंखा हटा दो उसकी जगह टेबल पैâन लगाओ। बच्चू अब लटक के दिखा
२. पंखे की रॉड इतनी कमजोर बनाओ कि जरा से बोझ से ही टूट जाए और नीचे आ जाए।
३. पंखे में रॉड की जगह स्प्रिंग लगाओ सो पूरा पंखा ही नीचे आ जाएगा।
जितने भी कोचिंग केंद्र हैं उनकी भी मजबूरी है उनको अपना सेंटर चलाना है अत: भले हर हफ्ते दो टेस्ट लेने पड़े, भले बच्चे दिन रात एक कर दें मगर सब कम है। दाखिले की पर्सेंटेज १०० पहुंच चुकी है और मजे की बात है कि यूनिवर्सिटी में कई कोर्स में दाखिला १०० फीसदी पर फुल/बंद हो जाता है। तो ऐसी मार-काट वाली स्थिति में जो न हो सो थोड़ा है।
जानकार लोग बताते हैं कि कोटा के सुसाइड्स को मोटा-मोटा दो श्रेणी में रख सकते हैं:
क. गरीब / निम्न मध्यम वर्ग के लोग अपने मकान/ अपनी जमीन अपना खेत रेहन रखकर हाई रेट पर कोचिंग की मोटी फीस भरते हैं। यह बात बच्चे को पता होती है। उस पर अपनी पढ़ाई के अलावा इस बात का भी बहुत दबाव होता है खासकर जब वह वांक्षित अंक वीकली टेस्ट में नहीं ला पाता। यह दबाव बढ़ता ही जाता है और किस घड़ी ब्रेकिंग पॉइंट पर पहुंच जाता है पता भी नहीं लगता। यहां बच्चे की मदद को कोई नहीं। बच्चा डिप्रेशन में चला जाता है।
ख. जगह-जगह के स्कूल में/बोर्ड में अंक प्रणाली अलग-अलग होती हैं। बच्चा अपनी बैकग्राउंड से कोटा का सामंजस्य नहीं बना पता है। जिस प्रकार की मेहनत वहां कराई जाती है वह बहुत निर्दयी किस्म की होती है। टेस्ट पर टेस्ट। कदम-कदम पर आपकी परख हो रही होती है। अब पता नहीं आपके बच्चे की रुचि है भी या नहीं। उसकी उतनी क्षमता है भी या नहीं, बस औरों की देखा देखी हम अपने बच्चे को झोंक आते हैं। फीस के पैसे देकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। आप देखते ही हैं न केवल कोचिंग सेंटर में बल्कि कॉलेज जाकर भी सुसाइड का डर सतत बना रहता है। अत: हमने अपने बच्चों को ‘नया दौर’ फिल्म का घोड़ा बना दिया है। कोचिंग सेंटर अपने पढ़ाने के रंग-ढंग नहीं बदलता बल्कि सुपरफीशियल काम करता है यथा पंखे की रॉड को कमजोर कर दो कम-से-कम हमारे सेंटर के कमरे में सुसाइड न करे।
वक्त आ गया है कि आप सोचें आखिर इंजीनीयरिंग ही एकमात्र क्षेत्र नहीं है और भी विषय हैं, जिनमें चमकने की उतनी ही या अधिक संभावनाएं हैं। आखिर मात्र पैसा कमाना ही जीवन का मुख्य या एकमात्र उद्देश्य नहीं। सफलता को मनाना हमें आता है मगर अपने बच्चे को असफलता से सामंजस्य बिठाना भी सिखाएं। उसे मशीन न बनने दें। उसे न बताएं कि पड़ोसी का बच्चा या फिर आपकी रिश्तेदारी में फलां का लड़का या लड़की ने झंडा लगा दिया है अब उसकी बारी है। आप अपने बच्चे के दोस्त नहीं बन सकते न बनें, पर उसके दुश्मन तो न बनें।

अन्य समाचार