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बढ़ रहा ‘लासा फीवर’ का खतरा… कोरोना जैसे हैं लक्षण

-२ से २१ दिन तक रहता है असर
-८० फीसदी लोगों में नहीं दिखाई देते लक्षण
सामना संवाददाता / मुंबई। कोरोना महामारी के बाद अब दुनिया में लासा फीवर का खतरा मंडराने लगा है। लासा फीवर दुनिया के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकता है। चूहे के मलमूत्र से पैâलनेवाली इस बीमारी को लेकर शोधकर्ता और विशेषज्ञ सतर्क हो गए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार इस बीमारी के लक्षण कोरोना जैसे हैं। लासा वायरस से संक्रमित व्यक्ति को तेज बुखार, सिरदर्द, गले में खराश, मांसपेशी में दर्द, सीने में दर्द, डायरिया, खांसी, पेट में दर्द और जी मिचलाना है। गंभीर मरीजों में चेहरे पर सूजन, फेफड़ों में पानी, मुंह और नाक से खून निकलने लगता है। मरीज के ब्लड प्रेशर में भी तेजी से गिरावट आने लगती है। इस बीमारी से संक्रमित होनेवाले ८० फीसदी लोगों में संक्रमण का कोई लक्षण नहीं दिखता है। पांच में से एक संक्रमित को गंभीर तकलीफ होती है। वायरस से शरीर के प्रमुख अंग लीवर और किडनी को बुरी तरह प्रभावित होने का साक्ष्य मिला है। गंभीर मरीजों की मौत का कारण ऑर्गन फेल्योर होता है। मनुष्य पर लासा फीवर का प्रभाव दो से २१ दिन तक रहता है। लासा फीवर एक्यूट वायरल हैमोरेजिक फीवर होता है, जो लासा वायरस के कारण होता है। लासा का संबंध वायरसों के परिवार एरिनावायरस से है। मनुष्य आमतौर पर इसकी चपेट में अफ्रीकी मल्टीमैमेट चूहों से आती है। घर का सामान या खाद्य पदार्थ जो चूहों के यूरिन और गंदगी से संक्रमित होता है, उसी से बीमारी फैलती है।
नाइजीरिया में फैली बीमारी
मौजूदा समय में नाइजीरिया में यह बीमारी तेजी से फैल रही है‌। नाइजीरिया में इस वर्ष ८८ दिनों में १२३ लोगों की मौत हो चुकी है। अब तक ६५९ लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है। ब्रिटेन में दो मरीज मिले हैं जबकि एक की मौत हुई है। अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार इस बीमारी की पहली बार पुष्टि वर्ष १९६९ में नाइजीरिया के लासा शहर में हुई थी। इसके बाद इसका नाम लासा रखा गया था। हर साल औसतन एक लाख से तीन लाख मामले आते हैं और पांच हजार मौत होती है। जेजे अस्पताल के डॉक्टर मंदार बताते हैं कि लासा फीवर को लेकर फिलहाल कोई जानकारी नहीं है। मुंबई में अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं आया है और घबराने की जरूरत नहीं है।

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