अंतिम उम्मीद

प्रभुनाथ शुक्ल
प्रज्ञान न जाने किस उधेड़बुन में खोया-खोया सा था। उसे कुछ अच्छा ही नहीं लग रहा था। दो-तीन दिन से उसने खाना भी मन से नहीं खाया था। बस! मौन सा खुद से बातें करता और बार-बार आसमान को निहारता। प्रज्ञान के भीतर चल रहे इस संघर्ष को पत्नी सरला अच्छी तरह समझती थी। वह पढ़ी-लिखी महिला थी, लेकिन वह भी बेबस थी।
प्रज्ञान! तुम इतने उदास मत हो। तुम्हारी उदासी मुझसे नहीं देखी जाती। तुम मेरी जिंदगी और उम्मीद हो। तुम्हारा विचलित होना मुझे अंदर से तोड़ता है। आज जब मेरा बुरा वक्त आ गया तो मुझे कोई नहीं पूछता। मेरे बाबू जी के जाने के बाद तुमने मेरे मायके की गिरी हालत को कहां से कहां पंहुचा दिया। आज मेरे भाई आसमान नाप रहें हैं, लेकिन अब उन्हें जीजा और दीदी चूसे हुए गन्ने की तरह लगते हैं।
प्रज्ञान मैं जानती हूं कि तुमने कितना कुछ नहीं किया मेरे भाईयों के लिए, लेकिन मेरी हालत पर अब कोई तरस नहीं खाता। लोग मुफ्त की कॉल भी नहीं करते। भाभियां कॉल उठाने से कतराती हैं। सोचती हैं कि कंगाली में कहीं मीना उनसे कुछ मांग न ले। देखो! प्रज्ञान मेरे पास एक उम्मीद है। अगर तुम चाहो तो मैं तैयार हूं। मेरी सगाई में जो तुमने मुझे अंगूठी पहनाई थी, वह अंतिम उम्मीद मेरे पास बची है। तुम चाहो तो मीना दीदी को यह अंगूठी राखी बंधाई दे सकते हो। आखिर तुम्हारी खुशी और तुम्हारे रिश्ते से बढ़कर मेरे लिए इस दुनिया में कुछ नहीं है। मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार और उम्मीद तुम हो। प्रज्ञान पत्नी सरला के इस प्रस्ताव को सुन उसे अपलक देखता रह गया।

अन्य समाचार

लालमलाल!