मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: राष्ट्र के नाम संबोधन

किस्सों का सबक: राष्ट्र के नाम संबोधन

डॉ. दीनदयाल मुरारका

यह घटना सन १९६२ की है। जब चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। हमले के कारण सभी देशवासियों के मन में अजीब डर एवं चिंता का माहौल था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आकाशवाणी से राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित होना था। इसके लिए प्रभारी अधिकारी मोहनदास सेंगर को प्रधानमंत्री के आवास पर बुलाया गया। मोहनदास सेंगर के पास प्रधानमंत्री के भाषण को ध्वनि मुद्रित कर उसके प्रसारण के कार्य की जिम्मेदारी थी। प्रचलित व्यवस्था के अनुसार प्रधानमंत्री को पहले अपने मूल भाषण को अंग्रेजी में राष्ट्र के नाम संबोधित करना था। उसके पश्चात हिंदी का अनुवाद पढ़ना था।
सेंगर साहब को यह अच्छा नहीं लगा कि अंग्रेजी भाषा को इस तरह प्राथमिकता देकर उसे महत्व दिया जाए, पहले उसे मूल पाठ के रूप में पढ़ा जाए और राष्ट्रभाषा हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाकर उसके साथ सौतेला व्यवहार किया जाए। नेहरू प्रधानमंत्री थे, जबकि सेंगर एक सरकारी अधिकारी। फिर भी उन्होंने नम्रता से नेहरूजी से कहा कि देश के इस नाजुक समय में भारत का प्रधानमंत्री हिंदी अनुवादक हो, यह ठीक नहीं लगता है। मेरी राय है कि आप राष्ट्र के प्रति संबोधन को प्रथम हिंदी में ही बोलें तो अधिक प्रभावी रहेगा। देश में हिंदी के प्रति लगाव की छवि बनेगी और एक अच्छा संदेश जाएगा। एक क्षण के लिए नेहरूजी, सेंगर साहब को देखते ही रह गए। फिर कुछ सोचकर उन्होंने कहा, ‘हां, तुम ठीक कहते हो। मूल भाषण हिंदी में संबोधित करना ज्यादा ठीक रहेगा।’ नेहरू जी ने बिना किसी झिझक के सेंगर के प्रस्ताव को मान लिया। नेहरूजी द्वारा उनके हिंदी को प्राथमिकता देने के सुझाव को स्वीकार करने के कारण नेहरू जी के प्रति उनका लगाव और बढ़ गया।

 

 

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