मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: बदलती परिस्थितियां

किस्सों का सबक: बदलती परिस्थितियां

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक व्यक्ति भीख मांगकर गुजारा करता था। उसका वृद्ध शरीर इतना जर्जर हो चुका था कि उसकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी। उसकी आंखों की ज्योति लगभग जा चुकी थी और शरीर में कुष्ठ रोग हो गया था।
एक युवक रोज-रोज उस भिखारी को देखता। उसे देखकर युवक के मन में घृणा और दया के भाव एक साथ उठते थे। वह सोचता इसके जीने का क्या फायदा? जीवन से इसे इतना लगाव क्यों है? ईश्वर इसे मुक्ति क्यों नहीं दे देते। एक दिन जब उससे रहा नहीं गया तो वह भिखारी के पास जाकर बोला- ‘बाबा तुम्हारी इतनी बुरी हालत है, तुम भीख मांगते हो, फिर भी तुम जीना क्यों चाहते हो? तुम ईश्वर से यह प्रार्थना क्यों नहीं करते कि वह तुम्हें इस नारकीय जीवन से मुक्त कर दे।’ इस पर वह भिखारी कुछ देर मौन रहा फिर बोला बेटा, ‘जो तुम कह रहे हो वही बात मेरे मन में भी होती है। मैं ईश्वर से बार-बार यही प्रार्थना करता हूं, पर वह मेरी सुनता ही नहीं। शायद वह चाहता है कि मैं इसी धरती पर बना रहूं, ताकि दुनियावाले मुझे देखें और समझें कि एक दिन उनकी भी हालत इस तरह की होगी। इसलिए किसी को भी अपने ऊपर किसी भी तरह का अभिमान नहीं करना चाहिए। मनुष्य की जिंदगी में सब दिन हमेशा एक से नहीं रहते।’ युवक भिखारी के शब्दों में छुपी बातों का मर्म समझ गया। उसे लगा कि भिखारी ने उसकी आंखें खोल दी। उसके बाद जीवन भर उसने फिर किसी के जीवन को छोटा समझने की गलती नहीं की। सच है हमारे जीवन में सुख-दुख की छाया लगातार आती-जाती रहती है। अत: सुख में हमें किसी प्रकार का अभिमान नहीं करना चाहिए और ना ही दुख में निराश होना चाहिए।

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