मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : अंतिम इच्छा

किस्सों का सबक : अंतिम इच्छा

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है एक राजा को किसी विदेशी राज्य से कांच की तीन सुंदर मूर्तियां उपहार के रूप में प्राप्त हुर्इं। मूर्तियां अपने आप में नायाब थीं। राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक नौकर नियुक्त कर दिया। नौकर रोज उन मूर्तियों की सफाई करता और उन्हें चमकाकर रखता।
राजा का स्पष्ट आदेश था कि मूर्तियों की देखभाल में कोई भी कोताही न बरती जाए। इसमें जरा भी लापरवाही हुई तो उसे कठोर दंड दिया जाएगा। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है? एक दिन सफाई के दौरान नौकर के हाथ से एक मूर्ति गिरकर टूट गई। राजा के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने तत्काल नौकर को मृत्युदंड देने की घोषणा की। नौकर को पकड़कर जेल में डाल दिया गया।
अगले दिन उसे फांसी होनेवाली थी। नौकर बुद्धिमान था। वह बचने के उपाय ढूंढ रहा था। आखिरकार, उसने एक रास्ता खोज ही लिया। उसने राजा से प्रार्थना की कि मरने से पहले उसकी अंतिम इच्छा पूरी की जाए। राजा ने पूछा, बताओ तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है? उसने कहा कि जिन मूर्तियों की मैंने जीवन भर देखरेख की है, उनमें से बची हुई दोनों मूर्तियों को मरने से पहले मैं अपने हाथ में लेकर देखना चाहता हूं। राजा ने इसकी अनुमति दे दी।
उसे उन मूर्तियों के पास ले जाया गया। उसने मूर्तियां हाथ में लीं और उन्हें फर्श पर जोर से पटक दिया। दोनों मूर्तियां चूर-चूर हो गर्इं। राजा ने जब यह सुना तो वह गुस्से में आगबबूला हो गया। उसने नौकर को बुलाकर उसकी इस हरकत के बारे में पूछा। नौकर ने बड़ी विनम्रता से जवाब दिया, महाराज, इस तरह मैंने दो लोगों की जान बचाने का काम किया है।
मेरे मरने के बाद आप इन मूर्तियों की देखभाल के लिए किसी न किसी को काम पर रखते और देखभाल के क्रम में उससे भी यह मूर्तियां टूट सकती थीं और आप उसे भी मृत्यु दंड देते। लेकिन जब मूर्तियां ही नहीं रहेंगी तो उन दो लोगों की जान तो बच जाएगी। मैंने जीवन के अंतिम क्षणों में एक पुण्य कार्य करने की कोशिश की है क्योंकि मानव जीवन को बचाना सबसे बड़ा नेक कार्य है। नौकर की इन बातों से राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने नौकर को उसी समय क्षमा कर दिया।

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