मुख्यपृष्ठनए समाचारकिस्सों का सबक : सीखने की जिजीविषा

किस्सों का सबक : सीखने की जिजीविषा

. दीनदयाल मुरारका

स्वामी रामतीर्थ पहली बार विदेश यात्रा पर निकले थे। जिस जहाज से वो यात्रा कर रहे थे उसमें नब्बे वर्ष के एक जर्मन व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई। वह बुजुर्ग, चीनी भाषा सीख रहे थे। स्वामी रामतीर्थ को बेहद आश्चर्य हुआ। चीनी एक कठिन भाषा मानी जाती थी। उसमें पांडित्य हासिल करने के लिए कम-से-कम १०-१५ सालों का अध्ययन होना जरूरी था।
स्वामी रामतीर्थ कई दिनों तक बड़े गौर से उस बुजुर्ग को देखते रहे। वह चीनी भाषा सीखने में इस कदर मशगूल रहते थे कि घंटों नजर उठाकर नहीं देखते थे। एक दिन रामतीर्थ ने उनसे कहा, ‘महाशय, आप इस उम्र में एक नई भाषा सीखने में क्यों अपना कीमती समय बर्बाद करते हो। पता नहीं आप कब तक भाषा सीख पाओगे और कब इसका उपयोग कर पाओगे?’ यह प्रश्न सुनकर जर्मन बुजुर्ग ने जवाब दिया, ‘किस उम्र की बात करते हैं आप? मैं इतना व्यस्त रहा हूं कि कभी अपनी उम्र का हिसाब भी नहीं रख पाया। क्योंकि अभी भी सीख ही रहा हूं। इसलिए अब तक बच्चा ही हूं। जहां तक मेरी मौत का सवाल है। तो वह तो पैदा होने के बाद ही मेरे सामने खड़ी थी। अगर उसका ही लिहाज रखता रहता। तो आज तक मैं कभी कुछ भी नहीं सीख पाता।’ बुजुर्ग की सीखने की गहरी लगन से स्वामी रामतीर्थ बहुत प्रभावित हुए। भारत लौटने पर उन्होंने अपने सभी शिष्यों को अपने इस अनूठे अनुभव के बारे में बताया और कहा, ‘हर मनुष्य को जीवन में कुछ-न-कुछ सीखते रहना चाहिए। सीखने का उम्र से कोई रिश्ता नहीं होता। जीवन में हमेशा नई बातें सीखने के लिए हम सभी को तत्पर रहना चाहिए। जीवन का अंत जरूर है, लेकिन वह कब होगा किसी को भी मालूम नहीं। अत: हमारा सीखना हमेशा जारी रखना चाहिए।’

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