मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : रेडियो जॉकी

किस्सों का सबक : रेडियो जॉकी

डॉ. दीनदयाल मुरारका

मियामी के गरीब इलाके में लेस ब्राउन और उनके जुड़वा भाई को उनकी कामवाली बाई ने गोद ले लिया था। बचपन से ही लेस को डिस्क जॉकी बनने की धुन सवार थी। घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी। इस हाल में भी ट्रांजिस्टर पर डिस्क जॉकियों के कार्यक्रम लेस सुनते थे।
लेस ने अपने एक छोटे से कमरे को काल्पनिक रेडियो स्टेशन बना लिया। बाल बनाने का ब्रश माइक्रोफोन बन जाता था और वह काल्पनिक सुननेवालों के सामने अपनी प्रस्तुति देते थे। किंतु उनकी लगातार मेहनत एवं बेहतर प्रस्तुति की चाह ने उन्हें अपने शहर के लोकल रेडियो स्टेशन तक पहुंचा दिया। वे वहां पर डिस्क जॉकियों के लिए कॉफी, लंच आदि पहुंचाने का काम करते थे।
किसी को अंदाजा नहीं था कि लेस के मन में क्या है? अचानक एक दिन एक डीजे की तबीयत खराब हो गई। लाइव कार्यक्रम चल रहा था। स्टेशन मास्टर बोले, ‘लेस, जल्दी से कहीं से एक डीजे तलाश कर लाओ।’ एक पल में ही लेस ने जवाब दिया, ‘सर डीजे का काम तो मैं खुद भी कर सकता हूं।’ स्टेशन मास्टर यह सुनकर हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, ‘आर यू श्योर?’ लेस ने कहा, ‘जी सर, इसके बाद वे कंट्रोल पैनल की सामनेवाली सीट पर बैठ गए और माइक्रोफोन का स्विच ऑन करते हुए उन्होंने कुछ ऐसे बोलना शुरू किया, जिसे ट्रांजिस्टर सुननेवाले श्रोताओं ने आज तक नहीं सुना था। आवाज में गजब का उत्साह, चुस्ती-फुर्ती और स्टाइल से श्रोताओं को जोड़ने की तरकीब ने उन्हें बहुत कम समय में ही सुपरहिट रेडियो जॉकी बना दिया। इसके बाद लेस ब्राउन का करियर जो शुरू हुआ, तो वह उन्हें राजनीति एवं सार्वजनिक भाषण, विश्व प्रसिद्ध मोटीवेटर और टेलीविजन के क्षेत्र तक ले गया। लेस ब्राउन ने साबित कर दिया कि यदि चाह हो तो लगन और संघर्ष की बदौलत व्यक्ति कहीं से भी शुरुआत कर शिखर तक पहुंच सकता है।

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