मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : सबसे बड़ा पुरस्कार

किस्सों का सबक : सबसे बड़ा पुरस्कार

डॉ. दीनदयाल मुरारका

यह बात रूस के साइबेरिया प्रांत की है। जाड़े के दिन थे, जबरदस्त बर्फबारी हो रही थी। एक निर्धन वृद्धा जो छोटे-मोटे काम कर गुजारा करती थी। वह अपनी झोपड़ी में सो रही थी। एकाएक उसने एक जोरदार आवाज सुनी। वह उठी और तेजी से पास स्थित नदी की ओर दौड़ी। उसका अनुमान था कि आवाज उधर से ही आई है।
नदी किनारे पहुंचकर उसने देखा की भयंकर हिमपात के कारण नदी पर बना पुल टूट गया। तभी उसे ध्यान आया कि यह समय एक रेलगाड़ी आने का है। वह परेशान हो उठी और रेलगाड़ी को दूर से ही रोकने का उपाय सोचने लगी। जिस इलाके में वह रहती थी, वहां दूर-दूर तक चारों ओर उजाड़ था। बस्ती उस स्थान से कोसों दूर थी। उसने सोचा कि प्रकाश द्वारा ड्राइवर को सूचना दी जा सकती है। वह दौड़ती हुई अपनी झोपड़ी में पहुंची। उसने अपनी बेटी को किसी तरह प्रकाश की व्यवस्था करने को कहा। लेकिन गरीबी के कारण घर में दूसरा कोई सामान नहीं था, जिसे जलाकर वह रोशनी कर ड्राइवर को सावधान कर सके। अचानक उसकी नजर अपनी चारपाई पड़ी। उसने जल्दी से अपनी बेटी की मदद से चारपाई को तोड़ डाला और रेलवे लाइन पर रख दिया। फिर उसने माचिस की तीली से उसमें आग लगा दी। तभी उसे ट्रेन की सिटी सुनाई दी। ट्रेन ड्राइवर ने प्रकाश देखकर पहले से ही रेलगाड़ी को धीमा कर दिया। जब गाड़ी रुकी और ड्राइवर ने टूटा हुआ पुल देखा। तो उसका सिर उस निर्धन वृद्धा के प्रति सम्मान से झुक गया। ट्रेन के मुसाफिरों में भी यह बात पैâल गई कि उस वृद्धा ने अपने घर की एकमात्र चारपाई तोड़कर सैकड़ों लोगों की जान बचाई है। वृद्धा को यात्रियों ने इनाम में कुछ पैसे देने चाहे तो उसने कहा, ‘मैं इतना छोटा इनाम नहीं लेती। आप लोग किसी की मदद कर देना यह मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।’

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