मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: ईश्वर की साधना

किस्सों का सबक: ईश्वर की साधना

डॉ. दीनदयाल मुरारका

रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद के प्रति बहुत अनुराग रखते थे। जब कई दिनों तक नरेंद्र नहीं आते, तो स्वामी जी खुद उन्हें बुलवा लेते थे। नरेंद्र नहीं चाहते थे कि स्वामी जी उनके साथ इतना ज्यादा जुड़ जाएं कि फिर उन्हें ईश्वर की साधना में बाधा आए और उनके हृदय को कष्ट पहुंचे।
वह उन्हें समझाने की तरकीब सोचने लगे। इसलिए एक बार नरेंद्र ने स्वामी जी से नाराजगी दिखाते हुए कहा, ‘आप मेरे लिए इतना स्नेह क्यों करते हो? आप जैसे महान पुरुष के लिए यह ठीक नहीं है।’ स्वामी  रामकृष्ण, नरेंद्र की बात सुनते रहे।

नरेंद्र ने कहा, ‘आपको राजा भरत का दृष्टांत तो याद ही होगा। राजा भरत दिन-रात अपने पाले गए हिरण के बारे में सोचते रहते थे। परिणीति यह हुई कि वह भी मृत्यु पश्चात हिरण की गति को ही प्राप्त हुए। इसलिए आपको भी मेरे बारे में इतना नहीं सोचना चाहिए। नरेंद्र की बात सुनकर स्वामी जी दुखी हो गए और मंदिर के भीतर चले गए। कुछ क्षणों के पश्चात वे हंसते हुए लौटे और नरेंद्र से बोले, ‘मैं तेरी कोई बात नहीं मानूंगा। मैंने भीतर जाकर देवी मां को तेरी बात बताई। तो मां ने कहा, तू नरेंद्र में नारायण को देखता है। इसलिए तो उससे इतना स्नेह करता है। तू नरेंद्र को नहीं उसके भीतर के नारायण को प्यार करता है।’ अपने प्रति स्वामी जी के प्रेम को देख नरेंद्र भाव विभोर हो गए। एक सच्चा गुरु ही अपने शिष्य को पहचान सकता है। सच्चा प्रेम नारायण के समान होता है। उसमें स्वार्थ नहीं होता है। सच्चा प्रेमी हर नर में नारायण देखता है।

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