मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : नियम का अनुशासन

किस्सों का सबक : नियम का अनुशासन

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है मद्रास में एक शानदार मछली घर बनाया गया था। धीरे-धीरे इसकी चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। बड़ी संख्या में लोग इसे देखने आने लगे। उसकी देखभाल सीनियर कक्षा के विद्यार्थी किया करते थे। मछली घर देखने के लिए प्रवेश शुल्क निर्धारित था। हर किसी को टिकट लेना पड़ता था।
एक दिन हैदराबाद के निजाम सपरिवार मछली घर देखने आए। निजाम को लगा कि वे देश के शासक वर्ग से जुड़े होने के कारण वह खास व्यक्ति है। उन्हें टिकट लेने की क्या जरूरत है? वह बिना टिकट लिए आगे बढ़ने लगे, तो मछली घर के व्यवस्थापक एवं कर्मचारी ने सोचा कि इतने बड़े आदमी हैं। इनका आना ही बड़ी बात है। इनसे क्या शुल्क लिया जाए? यह सोचकर सब अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए। किसी ने उनसे टिकट लेने को नहीं कहा। जब निजाम आगे बढ़े तो बुद्धिमान और परिश्रमी छात्र माधवराव ने उनके सामने आकर कहा महोदय, यहां प्रवेश का शुल्क निर्धारित है। बिना पैसे दिए मछली घर के अंदर जाना मना है।
यह सुनते ही निजाम कुछ शर्मिंदा होकर अपने निजी सचिव की ओर देखने लगे। सचिव ने इशारा पाते ही सभी के लिए टिकट खरीद लिए। अधिकारीगण को जब यह बात मालूम पड़ी तो वे चिंतित हुए। एक बोला यदि हम टिकट शुल्क नहीं लेते तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता? दूसरा बोला हां, ऐसा भी नहीं था कि उनके प्रवेश शुल्क न लेने से हमें भारी आर्थिक हानि होती। सभी अपनी अपनी राय दे रहे थे।
कुछ देर बाद माधवराव बोले, प्रश्न रुपए लेने की नहीं है। प्रश्न तो नियम के पालन की है। नियम का पालन सभी के लिए जरूरी है और बड़े व्यक्तियों को तो विशेष फर्ज बनता है कि वह नियम का सम्मान करने में आगे रहें। ताकि सामान्य लोग भी उनका अनुकरण कर सकें।
अगर विशेष लोग ही नियम तोड़ेंगे तो आम आदमी से नियम पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह जवाब सुनकर सभी अधिकारी चुप रह गए। उन्हें एहसास हो गया कि नियमों का पालन सभी के लिए जरूरी है।

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