मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक: शिक्षक और छात्र

किस्सों का सबक: शिक्षक और छात्र

दीनदयाल मुरारका

स्कूल में इतिहास की कक्षा चल रही थी। अध्यापक बच्चों को कोई पाठ पढ़ा रहे थे, पर बच्चों का ध्यान लिखने में कम था। बाहर के शोरगुल में उनकी रुचि ज्यादा थी। अध्यापक ने कक्षा के विद्यार्थियों पर नजर डाली तो उन्हें ऐसा लगा जैसे एक छात्र कुछ भी नहीं लिख रहा है। गौर से देखने पर यह पता चला कि वाकई में उसने तो अपने बैग में से कॉॅपी भी नहीं निकाली। उसे चुपचाप बैठा देखकर अध्यापक को क्रोध आ गया।
उन्होंने उससे पूछा कि तुम क्यों नहीं लिख रहे हो? छात्र ने जवाब दिया आपने जो पढ़ाया है वो मुझे पूरी तरह याद है, फिर मैं क्यों लिखूं? गुरु जी का आदेश हुआ, अच्छा तो सुनाओ, अगर ठीक-ठीक याद न हुआ तो बेंत से चमड़ी उधेड़ दूंगा। विद्यार्थी ने सारा पाठ सही-सही सुना दिया। गुरु जी मजबूर थे। वह उसे दंडित नहीं कर सके और मन मसोस कर रह गए।
अगले दिन उसी अध्यापक ने पढ़ाते-पढ़ाते फर्श पर नजर डाली तो देखा कि मूंगफली के छिलके चारों तरफ बिखरे पड़े थे। फिर क्या था, उन्होंने न किसी छात्र से कुछ पूछा और न ही किसी से जानकारी ली। बस, अपनी छड़ी उठाकर एक सिरे से सभी छात्रों को पीटने लगे। जब शिक्षक महोदय उस छात्र के पास पहुंचे तो उसने कहा इस तरह सबको मत मारिए, जिसने गलती की है, सिर्फ उसे ही दंड दीजिए।
छात्र की बात में दम था। छिलका गिरने के लिए सभी छात्र जिम्मेदार नहीं थे। उस छात्र की दृढ़ता और साहस देखकर शिक्षक महोदय दंग रह गए। वह छात्र कोई और नहीं, बल्कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे। उन्होंने आगे चलकर देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा देश को दिया।

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