मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : वेदना की अनुभूति

किस्सों का सबक : वेदना की अनुभूति

  • डॉ. दीनदयाल मुरारका

    एक समय की बात है एक राजा ने अपने राजकुमार को शिक्षा पाने के लिए गुरु के आश्रम में भेजा। राजकुमार ने आश्रम के सभी नियम और कायदे का पालन करते हुए मेहनत से शिक्षा पूरी की। शिक्षा पूरी होने के बाद जब राजकुमार के घर जाने का समय आया तो राजा अपने बेटे को लेने आश्रम पहुंचे। गुरु ने राजा का पूरा सम्मान किया और राजकुमार की खूब प्रशंसा की। आश्रम के सभी शिष्य उस समय वहां उपस्थित थे। राजकुमार ने गुरु के चरणों में प्रणाम करके विदा मांगी। गुरु बोले, बेटा जाने से पहले मेरी छड़ी लाकर दे दो।
    राजकुमार ने गुरु की छड़ी लाकर उन्हें दी। गुरु छड़ी लेकर खड़े हुए फिर सबके सामने उन्होंने राजकुमार को दो छड़ी कसकर लगा दी। गुरु के इस व्यवहार से सभी शिष्य आश्चर्य में पड़ गए। क्योंकि आज तक गुरु ने किसी शिष्य को छड़ी से मारने की बात तो दूर, किसी को डांटा तक नहीं था।
    वह सभी शिष्यों को बेटों की तरह मानते थे। मार खाकर राजकुमार भी निर्विकार भाव से खड़ा रहा। जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन राजा को क्रोध आ गया। वह बोले मेरे बेटे को किस अपराध के लिए दंडित किया? मुझे तो कुछ दिखाई नहीं पड़ा। गुरु मुस्कुरा कर बोले, राजन आप इसे नहीं समझेंगे। राजकुमार सभी शिष्यों में सर्वाेत्तम, विनम्र एवं आज्ञाकारी है। लेकिन उसकी शिक्षा का अंतिम पाठ अभी पूरा नहीं हुआ था। अब पूरा हो गया है। अब वह घर जा सकता है। मैं कुछ समझा नहीं आचार्य, राजन ने कहा। आचार्य बोले, महाराज आप राज्य के शासक हैं। अपनी प्रजा को आप कठोर दंड देने में जरा भी संकोच नहीं करते। कल को आपका बेटा भी आपका उत्तराधिकारी होगा। आपकी तरह इसे भी दूसरों को दंड देना पड़ेगा। उस समय अनुभूति होनी चाहिए कि दंड देते समय उसके मन की दशा क्या होती है? सफल शासक वही होता है, जो दूसरे की वेदना की अनुभूति करने में सक्षम हो। मैंने राजकुमार को उसी का अनुभव कराया है। राजा गुरु के सामने नतमस्तक हो गया।

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