मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : प्रेमचंद की हिम्मत

किस्सों का सबक : प्रेमचंद की हिम्मत

डॉ. दीनदयाल मुरारका
एक समय की बात है हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचंद गोरखपुर में अध्यापक थे। उन्होंने अपने यहां एक गाय पाल रखी थी। एक दिन चलते-चलते उनकी गाय उसी इलाके के अंग्रेज मजिस्ट्रेट के आवास के बाहर वाले बगीचे में चली गई। अभी वह वहां जाकर खड़ी ही हुई थी कि मजिस्ट्रेट गुस्से में बंदूक लेकर बाहर निकल आया। उसने आगबबूला होकर बंदूक में गोली भर ली। उसी समय अपनी गाय को खोजते-खोजते प्रेमचंद जी वहां पहुंच गए। उन्हें देखते ही मजिस्ट्रेट ने गुस्से में कहा कि तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुमने अपने जानवर को मेरे बगीचे में घुसा दिया। मैं अभी इसे गोली मार देता हूं, तभी तुम काले लोगों को ये बात समझ में आएगी कि हम लोग यहां पर हुकूमत  करने आए हैं। तुम्हें हमारी अहमियत समझ में आएगी। देखते ही देखते उसने बंदूक गाय की ओर तान दी।
प्रेमचंद ने मजिस्ट्रेट को नरमी से समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि महोदय, इस बार गाय पर मेहरबानी कर दीजिए। इसके बाद फिर कभी यह इधर नहीं आएगी, फिलहाल मुझे इसे यहां से ले जाने दें। गाय एक निरीह पशु है। इसकी गलती माफ कर दें। दरअसल, ये भटकते-भटकते यहां पर आ गई है। इसके बाद भी मजिस्ट्रेट झल्लाते हुए यही कहता रहा कि तुम काला आदमी इडियट हो। तुम्हारे पास अक्ल नाम की कोई चीज नहीं है। हम इस गाय को गोली मार देगा। उसने बंदूक से गाय को फिर निशाना लगाया।
इस पर प्रेमचंद झट से गाय और मजिस्ट्रेट के बीच में आकर खड़े हो गए और गुस्से में तमतमाकर बोले कि तो फिर चला गोली। देखता हूं आपमें कितनी हिम्मत है? तुम्हें पहले मुझे गोली मारनी पड़ेगी। यह सुनकर अंग्रेज की सारी हेकड़ी निकल गई। वो बंदूक की नली नीचे करके बड़बड़ता हुआ बंगले के भीतर चला गया। प्रेमचंद की दिखाई हुई हिम्मत के कारण अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझी।

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