मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : शास्त्र ज्ञान

किस्सों का सबक : शास्त्र ज्ञान

  • डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है राजा भोज के नगर में एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। एक दिन गरीबी से परेशान होकर उन्होंने राजभवन में चोरी करने का निर्णय किया। रात में वे राजभवन पहुंचे। सभी लोग सो रहे थे। सुरक्षा प्रहरियों की नजर से बचते हुए वह राजा के कक्ष तक पहुंच गए।
वहां पहुंचकर ब्राह्मण देखते हैं कि स्वर्ण, बहुमूल्य पात्र, इधर-उधर पड़े थे। किंतु वह जो भी वस्तु उठाने का विचार करते, उनका शास्त्र ज्ञान उन्हें उठाने से रोक देता था। ब्राह्मण ने जैसे ही स्वर्ण राशि उठाने का विचार किया, मन में स्थित शास्त्र ने कहा, स्वर्ण चोर नरकगामी होते हैं। इस तरह जो भी वस्तु वे वहां से लेना चाहते थे। उसी की चोरी को पाप बताने वाले शास्त्रीय वाक्य उनकी स्मृति में जाग उठता। इस तरह पूरी रात बीत गई। किंतु वे चोरी नहीं कर पाए। सुबह पकड़े जाने के भय से ब्राह्मण राजा के पलंग के नीचे छिप गए। महाराज के जाग जाने पर रानी एवं दासियां उनके अभिवादन हेतु प्रस्तुत हुर्इं।
राजा भोज के मुंह से किसी श्लोक की तीन पंक्तियां निकलीं, फिर वे अचानक रुक गए। शायद चौथी पंक्ति उन्हें याद नहीं आ रही थी। ब्राह्मण विद्वान से रहा नहीं गया। चौथी पंक्ति उन्होंने पूर्ण की। महाराज यह सुनकर चौक गए। उन्होंने ब्राह्मण को बाहर निकलने के लिए कहा तथा ब्राह्मण से यहां आने एवं चोरी न करने का कारण पूछा। ब्राह्मण ने कहा, राजन मेरा शास्त्र ज्ञान मुझे चोरी करने से रोकता रहा। उसी ने मेरे धर्म की रक्षा की है। राजा बोले, सत्य है कि ज्ञान उचित-अनुचित का बोध कराता है। जिसका धर्म संकट के क्षणों में उपयोग कर उचित राहत पाई जा सकती है। राजा ने ब्राह्मण की सत्यवादिता से प्रभावित होकर उन्हें प्रचुर धन देकर सदा के लिए उसकी निर्धनता दूर की। यह सच है कि जीवन में हमारा ज्ञान ही हमें कोई भी गलत कार्य करने से रोक सकता है।

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