मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : गृहस्थ धर्म!

किस्सों का सबक : गृहस्थ धर्म!

  • डॉ. दीनदयाल मुरारकादेशव्रत अपनी वृद्ध माता को अकेला छोड़कर एक मठ में चला गया। वहां वह साधना करने लगा। एक दिन प्रात: काल उसने स्नान करके अपना अंगोछा सूखने के लिए जमीन पर डाल दिया और वहीं आसन बिछाकर ध्यान मग्न हो गए। जैसे ही वह ध्यान मुद्रा से उठा, उन्होंने देखा कि एक कौआ अंगोछा को लेकर उड़ा जा रहा है। उनके क्रोध का ठिकाना न रहा।
    देशव्रत ने अपनी एक सिद्धि का प्रयोग किया और अपनी आंखों से अंगारे बरसाने लगा। कौआ तत्काल भस्म हो गया। देशव्रत अपनी इस उपलब्धि पर फूला  ना समाया। अहंकार से भरा वह भिक्षाटन के लिए निकला। उसने एक दरवाजे पर आवाज लगाई। उस समय घर के भीतर से लोगों की आवाज आ रही थी, पर कोई बाहर नहीं आ रहा था। देशव्रत ने पुकारा तो अंदर से एक स्त्री ने कहा, स्वामी जी अभी मैं अपने पति की सेवा में लगी हूं। कुछ क्षणों के बाद आ रही हूं।
    अहंकारी देशवृत ने चिल्लाकर कहा, दुष्ट तुझे मालूम नहीं इस अवज्ञा का परिणाम क्या होगा? तभी उस महिला ने बाहर आकर कहा कि मैं जानती हूं। आप मुझे शाप देंगे। पर मैं कौआ नहीं हूं कि मैं भस्म हो जाऊं। अपनी मां को छोड़कर, साधना करने वाले साधक, आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।
    देशव्रत को झटका लगा। उसने पूछा आप कौन हैं? आप किस की साधना करती हैं? महिला ने जवाब दिया मैं जिस गृहस्थ धर्म में हूं, उस धर्म की साधना में पूर्णतया समर्पित होकर करती हूं। आप चाहे तो इसे ही मेरी सिद्धि समझ सकते हैं, इसी से मुझे मुक्ति मिलेगी। देशव्रत का सिर लज्जा से झुक गया। वह भिक्षा लिए बगैर ही अपने घर की ओर चल पड़ा। वह सोच रहा था कि मैंने न तो गृहस्थ धर्म की साधना की और न ही साधु धर्म की। दोनों से भ्रष्ट होकर मैं कुछ तांत्रिक सिद्धियों को ही अपनी सफलता मान बैठा। उस दिन से वह अपनी मां की सेवा में लग गया तथा भविष्य में किसी बात का अहंकार न करने की ठानी।

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