मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : मृत्यु की अनिवार्यता

किस्सों का सबक : मृत्यु की अनिवार्यता

  • डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक बार एक महान तपोबल वाले महात्मा किसी लोहार के घर पर रुके। निर्धन लोहार ने उनका खूब आदर-सत्कार किया। महात्मा उसके आतिथ्य-सत्कार से बहुत प्रसन्न हुए। जाते समय उन्होंने लोहार से तीन वर मांगने को कहा। लोहार बोला, महाराज प्रथम तो मुझे जीवन में किसी वस्तु का अभाव न रहे और दूसरा मैं सौ वर्ष की आयु तक जीवित रहूं। महात्मा ने तथास्तु कहकर तीसरा वर मांगने को कहा। लोहार की कुछ समझ में नहीं आया, तो उसके मुंह से यह निकल गया कि मेरे यहां जो लोहे की कुर्सी है, उस पर जो बैठे वह मेरी मर्जी के बिना न उठ सके। महात्मा वर देकर चले गए।
लोहार ने प्रथम दो वरदानों की बदौलत बड़े ऐश्वर्य के साथ सौ वर्ष का जीवन पूर्ण किया। सौ वर्ष पूर्ण होने के बाद जब यमराज उसे लेने आए तो वह घबरा गया। उसने चतुराई दिखाते हुए यमराज से कहा, महाराज आप इस लोहे की कुर्सी पर विराजें। मैं अपने जीवन का अंतिम कार्य निपटा लूं। यमराज उस कुर्सी पर बैठकर उस लोहार के कैदी हो गए। लोहार ने खुश होकर मुर्गी खाने की सोची। किंतु जैसे ही उसने मुर्गी की गर्दन काटी वह तुरंत जुड़ गई। क्योंकि बिना यमराज के मौत कैसे आती। लोहार ने मन मारकर दाल-रोटी बनाई।
एक वर्ष होते-होते तो अनर्थ हो गया। मृत्यु के अभाव में हवा में कीट, पतंगे, मक्खी, मच्छरों की भरमार हो गई। सांस लेना दूभर हो गया। चूहों ने सारी फसल तबाह कर दी। पानी में जलीय जीव इतने हो गए कि इंसान के लिए पानी भी न बचा। अब लोहार को अपनी भूल का एहसास हुआ। किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पृथ्वी पर मानव जीवन जीना मुश्किल हो गया था। उसने यमराज को मुक्त कर उनसे क्षमा मांगी। उसे एहसास हो गया था कि जीवन के साथ मृत्यु की अनिवार्य आवश्यकता है। मृत्यु के अभाव में धरती नरक बन जाएगी। इसलिए प्राकृतिक नियमों का हमें आदर करना चाहिए।

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