मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक : गलती की सजा

किस्सों का सबक : गलती की सजा

डॉ. दीनदयाल मुरारका

महात्मा गांधी जी नियम के बड़े पाबंद थे। कोई भी नियम काफी सोच-विचार के बाद ही बनाते थे और स्वयं भी सख्ती से उसका पालन करते थे। उनके साबरमती आश्रम में भोजन के समय भोजन शाला में उपस्थित होने के लिए दो बार घंटी बजती थी। उस घंटी की आवाज सुनकर वहां रहनेवाले सभी लोग भोजन के लिए उपस्थित हो जाते थे। नियमानुसार जो व्यक्ति दूसरी घंटी बजने तक भोजनशाला में नहीं पहुंच पाता था। उसे दूसरी पंगत लगने तक बाहर बरामदे में ही खड़े रहकर इंतजार करना पड़ता था। बापू इसे लेटलतीफी की सजा कहते थे। दूसरी घंटी बजते ही रसोई घर के दरवाजे तुरंत बंद कर दिए जाते थे, जिससे लेट आनेवाला व्यक्ति अंदर जा ही ना सके। हर एक व्यक्ति के लिए नियम की पाबंदी रहती थी और सख्ती से इसका पालन किया जाता था।
एक दिन बापू लेट हो गए। लेकिन दरवाजा बंद करनेवाले आश्रमवासी ने उन्हें आते हुए देख लिया। वह बड़े धर्म संकट में पड़ गया। तभी महादेव भाई ने उससे कहा, ‘बापू के लिए नियम में ढिलाई नहीं बरती जाए। नियम तो नियम है। उसकी पाबंदी जरूरी है। दरवाजा बंद कर लो।’
बापू किसी से बात करते हुए दरवाजे के निकट आ गए थे, पर उस व्यक्ति ने दरवाजा बंद कर लिया। दरवाजा बंद देखकर बापू अनुशासित आश्रमवासी की तरह एक तरफ खड़े हो गए थे। वे प्रसन्न थे कि भोजन शाला में नियमों का पालन हो रहा है। तभी वहां हरिभाऊ उपाध्याय भी पहुंच गए। उन्होंने वहां बापू को खड़े देखकर कहा, ‘आज तो आप भी लेटलतीफी वाले कठघरे में खड़े हो गए हैं। मीठी सजा आज आपको भी भुगतनी पड़ रही है।बापू बोले, ‘हरिभाऊ, यह क्या करने जा रहे हो? मैं सजा भुगतने में कमजोर थोड़ी ही हूं और तुम भी तो वही सजा पा रहे हो।’

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