मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: कैप्टन का साहस

किस्सों का सबक: कैप्टन का साहस

डॉ. दीनदयाल मुरारका

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मित्र राष्ट्र संगठित रूप से जर्मनी से टक्कर ले रहे थे। ब्रिटेन के सार्जेंट निकोलस ने बर्लिन पर बमबारी करने के लिए उड़ान भरी। बमबारी के बाद जब वह वापस लौट रहा था तभी शत्रु सेना के विमान भेदी तोपों ने उसके जहाज पर बम बरसाना शुरू कर दिया। उसके विमान में आग लग गई। धीरे-धीरे आग पूरे विमान में पैâलने लगी।
निकोलस ने तुरंत अपने कप्तान से सहयोग की मांग की। लेकिन कप्तान उसकी बात सुनकर बोला, ‘इस समय तो हम लोग खुद मुसीबत में हैं और तुम्हारी सहायता नहीं कर सकते। लेकिन तुम इस मुसीबत में साहस का परिचय देकर अपनी मदद खुद करने की कोशिश करो।’ बस इसके बाद ही संपर्क टूट गया।

निकोलस बिना समय गंवाए पैराशूट निकालने के लिए केबिन की ओर बढ़ा। किंतु पैराशूट जलकर राख हो चुका था। यह देखकर निकोलस ने ईश्वर को याद किया और फिर हिम्मत कर फौरन विमान से कूद पड़ा। लेकिन जमीन पर आते ही वह बेहोश हो गया। चेतना लौटी तो उसने खुद को बर्फ से ढंका हुआ पाया। पैर की हड्डियों में चोट के कारण वह उठ भी नहीं पा रहा था। उस समय रात के दो बजे थे। उसे अनुमान तो था कि वह शत्रु के क्षेत्र में होगा। लेकिन बचने के लिए उसने अपनी कमर में बंधी सीटी बजा दी। सीटी सुनते ही शत्रु सैनिकों ने उसे बंदी बना लिया। निकोलस ने शत्रु सेना के अधिकारियों को सारा किस्सा बताया। विमान के अवशेष देखने के बाद शत्रु पक्ष के लोग भी निकोलस की हिम्मत और समझदारी पर दंग रह गए। युद्ध समाप्त होने पर सभी युद्ध बंदियों को रिहा कर दिया गया। इस तरह निकोलस सकुशल इंग्लैंड वापस पहुंच गया। मुसीबत में साहस का उपयोग ही सहायक होता है।

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