मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: कार्य के प्रति निष्ठा और लगन

किस्सों का सबक: कार्य के प्रति निष्ठा और लगन

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है सिवंâदर का सेनापति बहुत ही योग्य एवं ईमानदार था। सिवंâदर हमेशा अपने सेनापति से खुश रहा करते थे। एक बार सेनापति की मामूली सी गलती से नाराज होकर सिवंâदर ने उसे पद से हटाकर सूबेदार बना दिया। छोटा पद पाकर भी सेनापति ने नाराजगी नहीं दिखाई। सिवंâदर के निर्णय को सहर्ष स्वीकार करते हुए सूबेदार के पद पर वह अपनी निष्ठा और लगन से कार्य करने लगा।
उसके राज्य के प्रति समर्पण भाव में कुछ कमी नहीं आई। कुछ समय बाद सूबेदार सिकंदर के सामने पेश हुआ तो सिकंदर ने पूछा, ‘तुम सेनापति से सूबेदार बनाए गए लेकिन तुम हमेशा की तरह संतुष्ट और उत्साहित हो। यह वैâसे?’ सूबेदार ने कहा, ‘राजन, जब मैं सेनापति था। तब छोटे-छोटे अधिकारी मुझसे डरा करते थे, पर अब वह सब मुझसे प्यार करते हैं और मुझसे सलाह लेते हैं। मेरा मानना है कि सही अर्थों में, मुझे उनकी सेवा करने का अवसर आपके कारण मिला है।’
‘जब तुम सेनापति के पद से हटाए गए तो क्या आप अपमानित महसूस नहीं हुए?’ सिवंâदर ने प्रश्न किया। सूबेदार ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मेरे विचार में सम्मान पद में नहीं मानवता में है। ऊंचा पद पाकर कोई अहंकारी हो जाए और दूसरे को परेशान करे वह तो निंदनीय एवं अयोग्य है। दूसरे की सेवा करने, ईमानदार होने में ही सम्मान है। ऐसा होने पर वह सुखी और संतुष्ट रह सकता है। चाहे वह सेनापति हो, सूबेदार हो या सैनिक। सिवंâदर को सूबेदार के जवाब ने बहुत प्रभावित किया। उसने उसे अपने कक्ष में बुलाकर माफी मांगी और फिर से सेनापति बना दिया।

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