मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : वातावरण की खुशबू

किस्सों का सबक : वातावरण की खुशबू

डॉ. दीनदयाल मुरारका

अवंतिका देश के राजा रवि सिंह, महात्मा आशुतोष पर बड़ी श्रद्धा रखते थे। वह उनसे मिलने रोज उनकी कुटिया में जाते थे। हर बार वह महात्मा जी को अपने महल में आने के लिए निमंत्रण देते थे, किंतु महात्मा जी आने से मना कर देते थे। एक दिन राजा रवि सिंह ने महात्मा को महल में ले जाने की जिद कर ली। तब महात्मा ने कहा, मुझे तुम्हारे महल में दुर्गंध महसूस होती है। रवि सिंह अपने महल लौट आए। लेकिन काफी देर तक महात्मा की बातों पर विचार करते रहे।
कुछ दिनों के बाद राजा रवि सिंह फिर से महात्मा के पास पहुंचे तो महात्मा, राजा को पास स्थित एक गांव में घुमाने ले गए। दोनों जंगल पार कर उस गांव में पहुंचे जहां काफी पशु थे और वहां गांव में चमड़े के कई कारखाने भी थे, जिससे पूरे गांव में चमड़े की दुर्गंध आ रही थी। जब दुर्गंध सहन करने योग्य नहीं रह गई तो राजा ने महात्मा से कहा, यह दुर्गंध मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही। तब महात्मा ने कहा, यहां तो कितने लोग रहते हैं लेकिन दुर्गंध सिर्फ आपको ही आ रही है। यहां तो पूरा गांव बसा हुआ है लेकिन कोई भी दुर्गंध की शिकायत नहीं कर रहा।
राजा ने कहा कि ये लोग इसके आदी हो चुके हैं, किंतु मैं नहीं। तब महात्मा ने कहा, राजन तुम्हारे महल का भी यही हाल है। जहां पर विषय और विलासिता की दुर्गंध पैâली हुई है। तुम इसके आदी हो चुके हो। लेकिन मुझे वहां जाने की कल्पना से भी कष्ट होता है। जब हम किसी वातावरण, व्यवहार के आदी हो जाते हैं तो हमारी दृष्टि संकुचित हो जाती है। इसलिए जब तक वातावरण से दूर होकर विचार एवं चिंतन न करें तब तक हमें सही-गलत का ज्ञान नहीं हो सकता।

अन्य समाचार