मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: मानव सेवा

किस्सों का सबक: मानव सेवा

डॉ. दीनदयाल मुरारका

सत्यनगर के राजा सत्यप्रताप सिंह अत्यंत ही न्यायप्रिय शासक थे। एक दिन उन्हें पता चला कि सौम्यदेव नामक ऋषि अनेक वर्षों से लोहे का एक डंडा जमीन में गाड़कर तपस्या कर रहे हैं और उनके तप के प्रभाव से डंडे में अंकुर फूटकर उसमें फूल-पत्ती निकल रहा है। जब वे अपनी तपस्या में पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेंगे तो उनका डंडा फूल-पत्तों से लद जाएगा। सत्यप्रताप ने सोचा कि यदि उनके तप में इतना बल है कि लोहे के डंडे में अंकुर फूटकर फूल-पत्ते निकल सकते हैं, तो फिर मैं भी क्यों न तपस्या करके अपना जीवन सार्थक बनाऊं? यह सोचकर वह भी ऋषि के समीप लोहे का डंडा गाड़कर तपस्या करने लगे। संयोगवश उसी रात जोर का तूफान आया और मूसलाधार बारिश होने लगी। राजा और ऋषि दोनों ही मौसम की परवाह न करके तपस्या में लीन रहे। कुछ देर बाद एक व्यक्ति बुरी तरह भीगा हुआ ठंड से ठिठुरता हुआ वहां पर आया। उसने ऋषि से कहीं ठहरने के बारे में पूछा। ऋषि ने आंख खोलकर भी उसी तरफ नहीं देखा। निराश होकर वह राजा सत्यप्रकाश के पास पहुंचा और गिर पड़ा। राजा ने उसकी बुरी हालत देखकर उसे गोद में उठाया और नजदीक स्थित एक कुटिया में ले जाकर उसे लिटाया और उसके समीप आग जलाकर गर्माहट पैदा की। गर्माहट मिलते ही वह व्यक्ति होश में आ गया। इसके बाद राजा ने जड़ी-बूटी पीसकर उसे पिलाई। कुछ ही देर बाद वह व्यक्ति बिल्कुल ठीक हो गया। सुबह होने पर जब राजा उस व्यक्ति के साथ कुटिया से बाहर आया तो यह देखकर हैरान रह गया कि लोहे का डंडा जो उन्होंने गाड़ा था। वह ताजे फूल-पत्तों से भरकर झुक गया था। इसके बाद राजा ने ऋषि के डंडे की तरफ देखा। ऋषि के थोड़े बहुत निकले फूल-पत्ते भी मुरझा गए थे। राजा समझ गया कि मानव सेवा से बड़ी तपस्या और कोई नहीं। अपने राज्य वापस आकर वो प्रजा की समुचित देखभाल करने लगा, ताकि प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण हो सके।

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