मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : तीर्थ यात्रा का लक्ष्य

किस्सों का सबक : तीर्थ यात्रा का लक्ष्य

डॉ. दीनदयाल मुरारका
गांव के कुछ लोग संत तुकाराम से मिलने आए। उन्होंने तुकाराम से प्रार्थना की कि हम लोग तीर्थ यात्रा के लिए जा रहे हैं, आप भी हमारे साथ चलने की कृपा करें। तुकाराम जी ने उनके साथ जाने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए उन्हें एक छोटी सी गठरी देते हुए कहा, ‘इसमें कुछ ककड़ियां हैं। तुम जिन तीर्थ स्थानों पर जाना वहां इन्हें भी नदी या तालाब में स्नान करवाना और यात्रा से वापस आते समय इन्हें अपने साथ ले आना।’
खैर, तीर्थ यात्रा के दौरान उन लोगों ने तुकाराम के कहे अनुसार ही किया। वे भगवान का स्मरण करते हुए हर नदी में स्नान करते समय पोटली में बंधी हुई ककड़ियों को भी स्नान करवाते। कुछ समय के बाद वे सभी गांव वापस आ पहुंचे और तुकाराम जी के पास पहुंचकर ककड़ियों की पोटली उन्हें वापस थमा दी। उन्होंने तुकाराम को पोटली वापस करते हुए कहा, ‘इसे उन्होंने सभी तीर्थों में घुमाया है और पवित्र नदियों में स्नान कराया है।’ तुकाराम जी ने उन सबको दूसरे दिन भोजन के लिए अपने घर आमंत्रित किया।
तुकाराम जी ने उन ककड़ियों की सब्जी बनवाई और उसे भोजन में परोसा। भोजन करते समय ककड़ियों की सब्जी में कड़वापन सभी ने महसूस किया। भोजन करने के बाद सब एक ही स्थान पर बैठ गए। उनसे तुकाराम जी ने पूछा, ‘आप लोगों ने ककड़ियों को इतने तीर्थ स्थानों पर स्नान करवाया। क्या उसके कड़वेपन में कोई परिवर्तन हुआ?’ उन लोगों ने उत्तर दिया, ‘नहीं महाराज, ककड़ियों के कड़वेपन में कोई अंतर नहीं आया। वे तो जस की तस ही रहीं। तुकाराम जी उन्हें समझाते हुए बोले, ‘इतने तीर्थ स्थानों में स्नान करके और इतने मंदिरों में जाकर भी ककड़ियां कड़वी ही रहीं। उन्होंने अपने कड़वेपन का सहज गुण त्यागा नहीं। इसी प्रकार आप लोग भी तीर्थ यात्रा करने के बाद भी वैसे के वैसे बने रहते हैं। आप में भी कोई परिवर्तन नहीं आता है। जब आपके दुर्गुण छूटते ही नहीं तो सारी तीर्थ यात्रा व्यर्थ है। तीर्थ यात्रा से मनुष्य की बुद्धि का विकास होना चाहिए। उसके मन में परिवर्तन आने चाहिए। उसे शुद्ध और निर्मल बनाने के लिए ही तीर्थ यात्राएं रखी गई हैं। किंतु लोगों ने तीर्थ यात्रा को विनोद यात्रा में परिवर्तित कर दिया है, जो की सही नहीं है। हमारे विचारों में शुद्धता आना ही तीर्थ यात्रा का लक्ष्य है।’

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