मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : गलती का एहसास

किस्सों का सबक : गलती का एहसास

डॉ. दीनदयाल मुरारका

सरयू किनारे एक बड़े मंदिर में एक संत और उनके कुछ शिष्य रहते थे। अयोध्या के इस मंदिर के पास कई बीघा जमीन थी। संत और उनके शिष्य उस जमीन में खेती करते थे। नवंबर का महीना था। सर्दी पड़ रही थी। धान की फसल तैयार हो गई थी।
संत ने अपने शिष्यों से कहा कि कल सुबह फसल काटी जाएगी। लेकिन उसी रात एक घटना घट गई। कुछ बदमाश लोग खेत में आए और फसल काटकर उसका गट्ठर बनाकर जाने लगे। लेकिन कोहरे के कारण उन्हें रास्ता दिखाई नहीं दिया। लगता था वे सभी अंधे हो गए। अंतत: वे लोग रात के अंधेरे में खेती में ही भटक कर रह गए। सुबह होने पर संत ने अपने एक शिष्य से कहा, ‘रात में धान कट गया है। काटने वाले रात से भूखे हैं। उन्हें कुछ खाने को दे आओ।’
शिष्य खेत पर पहुंचा तो उसने फसल काटने वालों की खूब प्रशंसा की क्योंकि रात के अंधेरे में भी धान की कटाई ठीक से हुई थी। शिष्य ने उन्हें खाने को दिया। कुछ देर बाद संत अपने शिष्यों के साथ आए और बोले कटाई करनेवालों को मजदूरी दे दो। एक-एक बंडल धान काटने वाले को उनके मुआवजे के रूप में कुछ फसल दे दी गई। उस जमाने में मजदूरी फसल के रूप में ही दी जाती थी।
धान काटने वालों ने संत के पैर पकड़कर कहा, बाबा हमें मजदूरी नहीं चाहिए। आपने हमें जो रास्ता दिखाया है। वह जिंदगी भर की कमाई से ज्यादा है और वे लोग बिना मजदूरी लिए चले गए। एक शिष्य बोला बाबा मजदूरों ने मजदूरी क्यों नहीं ली?
बाबा ने बताया, धान काटने वाले मजदूर नहीं, चोर थे। मैंने उन्हें रात में ही धान काटते हुए देख लिया था। तब एक शिष्य बोला, बाबा आपने उन चोरों को क्यों जाने दिया? उन्हें सजा मिलनी चाहिए थी। बाबा बोले, कोई जन्म से चोरी सीखकर नहीं आता। तुमने देखा कि क्षमा करने से उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और अपनी गलती का एहसास ही किसी व्यक्ति के सुधरने का रास्ता होता है। शिष्य गुरु की बातों से सहमत हो गए।

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