मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : पीड़ितों की सेवा

किस्सों का सबक : पीड़ितों की सेवा

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है जब हमारा देश परतंत्र था। बारिश का मौसम था और गंगा में भयंकर बाढ़ आई हुई थी। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। अनेक लोग बाढ़ में फंस गए थे और सभी लोग रोटी, कपड़ा एवं जरूरी सामान के लिए तरस रहे थे। ब्रिटिश सरकार की सहायता अपर्याप्त थी। वैसे भी भारतीय जनता की ब्रिटिश प्रशासन को चिंता क्यों होती? अत: स्वतंत्रता सेनानियों ने बाढ़ पीड़ितों की सेवा करने का निश्चय किया और सभी ने मिलकर रुपए इकट्ठे किए।
राजेंद्र प्रसाद और अब्दुल बारी को यह रुपए बाढ़ पीड़ितों में भेजने के लिए दिए गए। साथ में खाने-पीने का सामान भी था। जब यह दोनों आरा के निकट कोइलवर पुल पर पहुंचे। तो वहां व्यक्तियों के गुजरने के लिए स्थान ही नहीं बचा था। रेलवे की पटरी भी थोड़ी कम नजर आ रही थी। राहत सामग्री कमर और कंधों पर बांधे राजेंद्र प्रसाद सोच रहे थे कि पुल वैâसे पार करें क्योंकि नीचे नदी की तेज धारा थी। तैर कर जाना संभव नहीं था। अब्दुल बारी भी कोई निर्णय नहीं कर पा रहे थे। राजेंद्र बाबू ने पूछा, ‘अभी कितने बजे हैं?’ बारी ने बताया, ‘दस बजे हैं।’ राजेंद्र बाबू बोले, ‘अभी किसी ट्रेन के आने का समय नहीं है। हम दोनों पटरी पर से होते हुए नदी पार कर लेते हैं।’ दोनों पीठ पर राहत सामान का गट्ठर बांधे, रेल की पटरी पर सावधानी से चलते हुए पुल पार कर गए। उन्होंने बाढ़ पीड़ितों को राहत सामग्री समय पर पहुंचा दी। बाद में जिसने भी इस घटना का जिक्र सुना उसे यकीन नहीं हुआ। सबने डॉ. राजेंद्र बाबू और अब्दुल बारी की बहुत प्रशंसा की। जब लोगों ने डॉ. राजेंद्र बाबू से इस बात की चर्चा की तो उन्होंने कहा, ‘पीड़ित मानव की यथाशक्ति सहायता करना ही सबसे बड़ा पुण्य है।’

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