मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकिस्सों का सबक: जीतने की जिजीविषा

किस्सों का सबक: जीतने की जिजीविषा

डॉ. दीनदयाल मुरारका

रॉजर क्रेफोर्ड एक्ट्रोडैकिटलिजम बीमारी से पीड़ित थे। यह एक असामान्य जन्मजात डिसऑर्डर है। अमेरिका में पैदा होनेवाले ९०,००० बच्चों में से एक को यह बीमारी होती है। डॉक्टर ने बताया कि रॉजर कभी चल नहीं पाएंगे। रॉजर जैसे-जैसे बड़े होते गए उनकी विकलांगता पहचान में आने लगी। माता-पिता उनका उत्साह बढ़ाते हुए कहते, ‘बेटा तुम विकलांग वहां तक हो, जहां तक तुम खुद को विकलांग समझते हो। वरना दुनिया की कोई ताकत तुम्हें विकलांग नहीं बना सकती। तुम अत्यधिक बुद्धिमान हो और पूरी दुनिया पर विजय पाने की ताकत रखते हो।’ इसका नतीजा यह हुआ कि रॉजर अपनी विकलांगता भूलकर अपनी रुचि को तलाशने में जुट गए।

उन्हें फुटबॉल खेलना बहुत पसंद था। पिता ने उन्हें फुटबॉल खेलने के तरीके बताए। रॉजर को १२ साल की उम्र में स्कूल की फुटबॉल टीम में शामिल होने में सफलता मिल गई। हर मैच से पहले उनके माता-पिता उसकी प्रशंसा करते और कहते, ‘बेटा, तुम्हारी अवश्य जीत होगी।’ यह सुनकर रॉजर कल्पना करने लगता कि वह गोल कर रहे हैं। एक दिन फुटबॉल खेलते समय वह नकली पैर से तेजी से गोल पोस्ट की तरफ भागे। उनके कोच और टीम खुशी से चिल्लाने लगी। महज दस गज की दूरी पर दूसरी टीम के खिलाड़ी ने रॉजर के बाएं टखने को पकड़ लिया। आखिर नकली पैर विरोधी टीम के खिलाड़ी के हाथ में आ गया। विरोधी टीम का खिलाड़ी हैरानी से उन्हें देखता रहा। उसी दौरान वह उछलकर चलने लगे।
रॉजर का खेल प्रेम बढ़ता गया। कॉलेज में उन्होंने टेनिस खेलना शुरू किया। आज भी वे ऐसे पहले विकलांग टेनिस खिलाड़ी हैं। जिन्हें यूनाइटेड स्टेट्स प्रोफेशनल टेनिस एसोसिएशन ने टीचिंग प्रोफेशनल के रूप में प्रमाणित किया है। वह कहते हैं कि ‘आपकी हालत चाहे वैâसी भी हो आप विजेता बन सकते हैं।’

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