मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : सनातन संस्कृति

किस्सों का सबक : सनातन संस्कृति

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है, जब जबलपुर सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। रात होते ही नगर में कर्फ्यू लगा दिया जाता था। शहर में चारों ओर डर का वातावरण निर्माण हो गया था। नगर के एक मुसलमान सज्जन ए.एच. खान अपने रिश्तेदार को ट्रेन में बैठाने के लिए रेलवे स्टेशन गए। गाड़ी लेट होने के कारण लौटते समय कर्फ्यू का समय हो गया। सड़कें सुनसान हो गईं और खान साहब भयग्रस्त हो गए। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें? वह किसी तरह अपने आपको हिम्मत देते हुए वापस लौट रहे थे। तभी अचानक उन्होंने आहट सुनी और तुरंत ही बगल की एक गली में मुड़ गए।
गली में थोड़ी दूर आगे जाने के बाद उन्होंने वहां पर एक मकान का पिछवाड़ा देखा जो महलनुमा लग रहा था। वहां पर उन्हें माथे पर तिलक धारण किए, गले में कंठी पहने एक सज्जन टहलते हुए दिखाई दिए। सज्जन ने खान साहब को बुलाया और उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि मैं तुम्हारी चिंता समझ रहा हूं। तुम रात भर मेरे घर में विश्राम करो।
सवेरे कर्फ्यू उठते ही आप घर लौट जाना। खान साहब झिझकते हुए रुक गए। भोजन के बाद उन्हें शैय्या उपलब्ध कराई गई। सवेरे उठने पर मकान मालिक ने उन्हें जलपान कराया। खान साहब विदा होते समय बोले, आप तो साक्षात देव पुरुष हैं। मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा, मैं बहुत कृतज्ञ हूं। वह सज्जन पुरुष कोई और नहीं हिंदी साहित्यकार तथा सांसद सदस्य सेठ गोविंद दास थे। उन्होंने कहा, इस कृतज्ञता ज्ञापन की कोई आवश्यकता नहीं, हमारी सनातन संस्कृति में मेहमानों को देवता कहा गया है। मैंने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाया है।
-डॉ. दीनदयाल मुरारका

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