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किस्सों का सबक : सिगमंड फ्राइड

डॉ. दीनदयाल मुरारका
प्रख्यात मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्राइड छुट्टी के दिन अपने परिवार के साथ एक पार्क में घूमने गए। लौटते समय देखा तो उनका बच्चा गायब था। पति-पत्नी बातों में इतने मशगूल थे कि बच्चे का ध्यान ही नहीं रहा। बच्चे को न पाकर उनकी पत्नी काफी घबराई।
मगर फ्राइड को जैसा कुछ हुआ ही नहीं। वह एकदम निश्चिंत चले जा रहे थे। फ्राइड को इस तरह निश्चिंत देखकर उनकी पत्नी गुस्से में बोली, ‘आप इस तरह खामोश क्यों है? देखिए न वह कहां चला गया। क्या आपको उसकी चिंता नहीं है?’ फ्राइड ने उसे समझाते हुए कहा, ‘इतना घबराओ मत। वह मिल जाएगा।’
पत्नी ने खीझकर कहा, ‘बिना खोजे कैसे मिल जाएगा?’  फ्राइड ने पूछा, ‘क्या तुमने उसे कहीं जाने से मना किया था।’ पत्नी को थोड़ी देर सोचने के बाद याद आया कि उसने बच्चे को फव्वारे के पास जाने के लिए मना किया था। फ्राइड बोले, ‘फव्वारे के पास ही होगा।’ पत्नी ने कहा, ‘तुम्हें यकीन है।’ फ्राइड ने कहा, ‘जब हम बच्चे को जहां जाने के लिए मना करते हैं। वे वहां अवश्य जाते हैं।’ बच्चा वाकई फव्वारे के पास बैठा था और पानी की धार को देख रहा था। पत्नी के भीतर जिज्ञासा जागी कि आखिर फ्राइड ने यह कैसा पता लगाया कि बच्चा फव्वारे के पास ही बैठा होगा? फ्राइड ने इसे स्पष्ट करते हुए बताया कि बच्चा वहीं जाएगा जहां उसे जाने के लिए मना किया है। इसी तरह उसे जिस काम को करने से रोका जाएगा। वह उसे जानबूझकर करेगा। फ्राइड ने इस रहस्योद्घाटन के बाद बताया कि मनोविज्ञान में यह बातें समान रूप से बड़ों पर भी लागू होती हैं। यदि हमें कोई काम करने के लिए मना किया जाता है। तो हम में उस कार्य को करने की उत्सुकता जाग उठती है कि यह देखें तो सही कि उसमें क्या है?

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