मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : बुद्ध की अंतिम शिक्षा

किस्सों का सबक : बुद्ध की अंतिम शिक्षा

  • डॉ. दीनदयाल मुरारका

महात्मा बुद्ध के जीवन के अंतिम दिनों की बात थी। उस दिन उन्होंने अपना आखिरी भोजन ग्रहण किया। उस भोजन को उन्होंने कुंडा नामक एक लोहार से भेंट के रूप में प्राप्त किया था, लेकिन भोजन करने के बाद में वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुंडा को समझाएं कि उससे कुछ गलती नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि भोजन तो अमृत तुल्य है।
भगवान बुद्ध जब मृत्यु शैया पर अंतिम सांसें गिन रहे थे। तब पास से किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। गौतम बुद्ध ने अपने नजदीक बैठे शिष्य आनंद से पूछा यह कौन रो रहा हैं? आनंद ने कहा, भंते, भद्रक आप के अंतिम दर्शन के लिए आया है। बुद्ध ने कहा, आप उसको मेरे पास बुला लो। बुद्ध के पास आते ही भद्रक फूट -फूटकर रोने लगा। उसने कहा, आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखाएगा?
बुद्ध ने भद्रक से कहा, भद्रक, प्रकाश तुम्हारे भीतर है। उसे बाहर ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं। जो अज्ञानी हैं, वो उसे देवालयों, तीर्थों, कंदराओं एवं गुफाओं में भटकते हुए खोजने का प्रयत्न करते हैं और वे सभी अंत में निराश होते हैं। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर जो साधना में निरंतर लगे रहते हैं, उनका अंत:करण स्वयं दीप्तिमान होता है।
इसलिए भद्रक, आप स्वयं दीपक बनो। यही मेरा जीवन दर्शन है। मैं इसे आजीवन प्रचारित करता रहा। भगवान बुद्धका यह अंतिम उपदेश सुनकर भद्रक को समझ में आ गया कि अपना दीपक स्वयं बनाने के लिए उसे क्या करना होगा ? उसने उसी दिन से मन, वाणी, कर्म, से एकनिष्ठ होकर साधना करने का मन बना लिया और कुछ ही समय बाद वे खुद को भीतर से चैतन्यवान महसूस करने लगे।

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