मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : दिशाशूल

किस्सों का सबक : दिशाशूल

डॉ. दीनदयाल मुरारका

राजा वसुसेन एक पुरुषार्थी और चक्रवर्ती राजा थे। मगर उनके राज ज्योतिष ने उनकी मति ज्योतिषी की ओर फेर रखी थी। हाल यह हो गया था कि वह बिना मुहूर्त जाने कोई काम नहीं करते थे। शत्रुओं को यह पता चला तो वे भी ऐसे मुहूर्त में घात लगाने लगे, जिसमें प्रतिकार का मुहूर्त ना बने और वसुसेन को परास्त किया जा सके। प्रजा जन एवं राज्य सभासद सभी को राजा के इस कुचक्र में फंस जाने पर बड़ी चिंता होने लगी। संयोगवश राजा एक बार देश के दौरे पर निकले। साथ में राज ज्योतिष भी थे। रास्ते में एक किसान मिला जो हल बैल लेकर खेत जोतने जा रहा था। राज ज्योतिष ने उसे रोककर कहा, ‘मूर्ख जानता नहीं? आज जिस दिशा में तुम जा रहे हो, उधर दिशाशूल है, उस दिशा में तुम्हारे जाने से भयंकर हानि उठानी पड़ेगी।’ राज ज्योतिष, राजा के सम्मुख अपना ज्ञान दिखा रहे थे।
किसान दिशाशूल के बारे में कुछ नहीं जानता था, सो उसने सहज ही कहा, ‘मैं तो प्रत्येक दिन इसी दिशा में जाता हूं। आज नहीं, पिछले कई सालों से ऐसा ही कर रहा हूं। इसमें दिशाशूल वाले दिन भी आए होंगे। यदि आपकी बात सच होती तो मेरा कब का सर्वनाश हो गया होता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, मैं तो सुख से जी रहा हूं।’
किसान का ऐसा जवाब सुनकर ज्योतिषी सकपका गए। अपनी झेंप मिटाने के लिए वे बोले, ‘लगता है तेरी कोई हस्तरेखा बहुत प्रबल है, दिखा तो अपना हाथ।’ किसान ने हाथ बढ़ा दिया, किंतु हथेली नीचे की ओर रखी। ज्योतिष इस पर और अधिक चिढ़ गए और बोले, ‘इतना भी नहीं जानता कि हस्तरेखा दिखाने के लिए हथेली ऊपर की ओर रखी जाती है।’ किसान बोला, ‘हथेली वो पैâलाएं जिसे किसी से कुछ मांगना है। जिन हाथों की कमाई से अपना गुजारा करता हूं, उन्हें किसी के आगे क्यों फैलाऊं? मुहूर्त तो वह देखें, जो कर्महीन और निठल्ला हो। मुझे तो अपने कर्म और कर्मफल पर जरा भी संदेह नहीं।’ राजा वसुसेन यह सुनकर समझ गए कि कर्मफल भाग्य से अधिक प्रभावी होता है।

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