मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक:व्यवहारिक ज्ञान

किस्सों का सबक:व्यवहारिक ज्ञान

डॉ.दीनदयाल मुरारका
एक दार्शनिक थे। वह हर समय अध्ययन-मनन में लगे रहते थे। वह लोगों को समय-समय प्राथमिक ज्ञान देते थे। उनके घर से थोड़ी दूर पर एक नदी बहती थी। नदी पर बांध बनाकर एक जलाशय का निर्माण किया गया। उस जलाशय के स्वच्छ जल में वे स्नान किया करते थे। जलाशय में लहरें अठखेलियां किया करती थीं, जिन्हें देखकर दार्शनिक का मन मचलता था।
वह उसमें तैरकर जलक्रीड़ा का पूरा सुख उठाना चाहते थे, पर वे तैरना नहीं जानते थे। इसलिए किनारे पर स्नान कर संतुष्ट हो लेते थे। एक दिन अपने मन की बात उन्होंने अपने एक शिष्य को बताई। दूसरे दिन शिष्य ने एक पेटी लाकर देते हुए उनसे कहा, ‘इसे आप अपने पेट पर बांधकर कितने भी गहरे पानी में चले जाएंगे तो डूबेंगे नहीं।’
दार्शनिक महोदय पेटी लेकर जलाशय पर गए और उसे हाथ में पकड़कर बड़े उत्साह से जल में कूद पड़े और कूदते ही पानी के अंदर चले गए। घबराहट में वो कुछ समझ न सके और हाथ-पैर मारने लगे। लेकिन उन्हें लगा जैसे वो अंदर ही चले जा रहे हैं। संयोग से एक आदमी उनके पास ही स्नान कर रहा था। उसने उन्हें डूबते हुए देखा और झट से उनके पास पहुंचा और उन्हें खींचकर किनारे पर ले आया। दार्शनिक की जान में जान आई। वह कुछ देर हांफते रहे। फिर जब थोड़ा स्थिर हुए तो उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा, ‘क्यों भाई यह पेटी तो आदमी को डूबने नहीं देती। मैं वैâसे डूब गया?’ यह सुनकर वो आदमी जोर से हंसा और बोला- ‘आप विद्वान हैं। मगर कोरा किताबी ज्ञान ही काफी नहीं है। व्यावहारिक पहलुओं को समझना और जानना भी बेहद जरूरी है। यह पेटी तभी मदद करती है, जब पेट पर बांधी जाती है, पर आपने इसे हाथों में ले रखा था। इसलिए आपने गौर किया होगा कि पेटी और आपके हाथ नहीं डूबे थे। पानी की सतह पर ही थे। अत: जिंदगी में व्यावहारिक ज्ञान का अपना महत्व होता है।’

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