मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : सेवा की परंपरा

किस्सों का सबक : सेवा की परंपरा

डॉ. दीनदयाल मुरारका

उस समय की बात है जब कबीर दास की प्रसिद्धि दूर-दूर तक पैâल गई थी। बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आते थे। एक दिन जब वह कपड़ा बुन रहे थे। तब उनके पास कई सेठ लोग आए और बोले, ‘अब आप साधारण व्यक्ति नहीं रहे। जब साधारण व्यक्ति थे, तब तो आपका कपड़ा बुनना ठीक था, पर अब आपकी चर्चा संत के रूप से होती है। आपको फटे-पुराने कपड़े में देखकर हमें शर्म महसूस होती है। फिर आपको अपने हाथ से कपड़ा बुनने की आवश्यकता क्यों है? हम लोग आपकी हर जरूरत को पूरा करेंगे। आपके लिए एक भव्य आश्रम बना देंगे।’ उनकी बातों को सुनकर कबीर ने कहा, ‘पहले मैं अपने लिए कपड़ा बुनता था, मगर अब गरीब लोगों के लिए बुनता हूं। मेरी देखा-देखी और भी लोग यह काम करेंगे। मनुष्य को अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए। आज आप उस समय हमारी मदद करने आए हैं, जब मुझे बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं है। आप उनकी सहायता करें, जिन्हें आपकी जरूरत है। कभी भी सेवा का उद्देश्य अपना प्रचार-प्रसार ना रखें।’ यह सुनकर वहां उपस्थित सारे सेठ शर्मिंदा हो गए और उन्होंने उनसे माफी मांगी। उन्होंने कबीर को वचन दिया कि वे लोग काशी घाट पर गरीबों को खाना खिलाने का काम शुरू करेंगे। तब से शुरू हुई वह परंपरा काशी में आज भी जारी है। अच्छे उद्देश्यों से शुरू की गई परंपरा हमेशा कायम रहती है।

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