मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक: राज्यसभा की सदस्यता

किस्सों का सबक: राज्यसभा की सदस्यता

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक समय की बात है जब राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्य की बहुत धूम थी। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे लोग भी उनके प्रशंसकों में से एक थे। इसलिए यह सोचा गया कि श्री माखनलाल चतुर्वेदी को राज्यसभा में लाया जाए और उन्हें राज्यसभा की सदस्यता दी जाए। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान का भी सम्मान होगा और संसद में साहित्य का प्रतिनिधित्व भी हो जाएगा। लेकिन इस काम को कैसे अंजाम दिया जाए? क्योंकि माखनलाल जी के बारे में मशहूर था कि वह अत्यंत स्वाभिमानी, सम्मान और प्रदर्शन से दूर रहनेवाले और एकांत में रहकर साहित्य की सेवा करनेवाले व्यक्ति हैं। इसलिए पहले उन्हें तैयार करने की जिम्मेदारी प्रदेश कांग्रेस को सौंपी गई। पार्टी के लोग एक स्थानीय प्रतिनिधि मंडल को लेकर माखनलाल जी के यहां पहुंचे एवं उनसे निवेदन किया कि यदि वे राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार कर लें तो राज्यसभा में हिंदी साहित्य का भी प्रतिनिधित्व होगा। खासकर, खंडवा के लोग बहुत गौरवान्वित महसूस करेंगे। बनारसी दास जी, राष्ट्रपति के दूत बनकर माखनलाल जी के पास पहुंचे। उनसे बहुत आग्रह किया। लेकिन तब भी वे नहीं माने और प्रस्ताव को बड़ी विनम्रता से इनकार कर दिया। उन दिनों माखनलाल जी के पास उनका एक सहायक उनकी पढ़ाई-लिखाई में सहायता करता था। एक दिन मौका देखकर उसने उनसे पूछा, ‘दादा, आप राज्यसभा की इतनी महत्वपूर्ण सदस्यता क्यों ठुकरा रहे हो?’ उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, ‘देखो कला जीवन में अपना अनुवाद चाहती है। साहित्य में तुम त्याग और सादगी का गुणगान करो। मगर वास्तविक जीवन में उसका लालच बना रहे। तो वह कला कभी अपनी ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकतीं।’ उनकी बात सुनकर सहायक नतमस्तक हो गया।

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