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किस्सों का सबक : शोध पत्र

डॉ. दीनदयाल मुरारका
प्रोफेसर सत्येंद्रनाथ बोस प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। प्रोफेसर सत्येंद्रनाथ बोस, अल्बर्ट आइंस्टीन को अपना गुरु मानते थे। बोस के एक महत्वपूर्ण शोध पत्र का आइंस्टीन ने जर्मन में अनुवाद किया था। वह शोध पत्र प्रकाशित होकर काफी चर्चित भी हुआ था।
आइंस्टीन जिंदगी भर प्रयोगों और शोधों में लगे रहे। अंतिम समय में वे एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत (यूनिफाइड फील्ड थ्योरी) पर काम कर रहे थे। प्रोफेसर बोस ने एक शोध पत्र तैयार किया, जिसमें आइंस्टीन के उस सिद्धांत की विवेचना के साथ उसकी अनेक भ्रांतियों का खुलासा भी किया था। बोस अपने इस सभी लेखों को आइंस्टीन को दिखानेवाले थे, ताकि उनसे विचार-विमर्श कर उन लेखों को विश्व के सामने लाया जा सके। वह आइंस्टीन के पास जाने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक खबर आई कि आइंस्टीन की मृत्यु हो गई। यह सुनकर बोस सुध-बुध खो बैठे।
जब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को संभाला और उस शोध पत्र को कहीं भेजने की बजाय नष्ट कर डाला। क्योंकि उनके मुताबिक यह शोध पत्र उनके गुरु आइंस्टीन के सिद्धांत पर आधारित था। इसलिए उनकी सहमति के बिना उसे प्रकाशित करना, गुरु का अपमान था।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुसंधान की दृष्टि से बोस का यह कदम उचित नहीं था। लेकिन उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं हुआ। आइंस्टीन के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा थी। वह शोधपत्र यदि आइंस्टीन की सहमति के बाद प्रकाशित हो जाता तो निश्चित रूप से सत्येंद्रनाथ बोस की छवि आज अलग ही होती। मगर उन्होंने अपना शोध पत्र फाड़कर अपने गुरु को अनुपम गुरु दक्षिणा दी।

 

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