मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : बहता पानी

किस्सों का सबक : बहता पानी

डॉ. दीनदयाल मुरारका

एक बार एक बालक परीक्षा में फेल हो गया। उसके साथियों ने इस पर उसका खूब मजाक उड़ाया। इससे उस लड़के को गहरा सदमा पहुंचा। उस बात से वह अत्यंत तनावग्रस्त रहने लगा। उसने पढ़ना-लिखना और यहां तक कि ढंग से खाना-पीना भी छोड़ दिया। हर समय वो एक कोने में गुमसुम बैठा रहता था।
बालक के माता-पिता ने उसे समझाते हुए कहा, ‘बेटा, एक बार फेल हो गए हो ना, यह इतनी बड़ी असफलता नहीं है, जिससे तुम इस तरह परेशान हो जाओ। आखिर कब तक यह चलेगा, जो हुआ है उसे भूल जाओ और आगे की सोचो।’ माता-पिता के समझाने के बावजूद बालक को संतुष्टि नहीं मिली। मानसिक अशांति और निराशा में उसे कुछ नहीं सूझा इसलिए एक रात वो आत्महत्या करने के लिए चल पड़ा। रास्ते में एक बौद्ध मठ मिला जहां से कुछ आवाजें आ रही थीं। वह बालक उत्सुकतावश उन आवाजों को सुनने के लिए मठ के अंदर चला गया। जहां उसने देखा कि एक भिक्षु कह रहा था कि पानी गंदा क्यों नहीं होता? क्योंकि वह बहता रहता है। पानी के मार्ग में बाधाएं क्यों नहीं आतीं? क्योंकि वह बहता रहता है। पानी की एक-एक बूंद बहने से नदी, नदी से महानदी, महानदी से समुद्र क्यों बन जाता है? क्योंकि वह बहता रहता है। इसलिए तुम रुको मत, बहते रहो। जीवन में असफलताएं आती हैं। लेकिन तुम उनसे घबराओ मत। उन्हें पार कर दोगुनी मेहनत करते चलो। लगातार बहना और चलना ही जीवन है। एक असफलता से ही घबराकर रुक गए। तो उसी तरह खराब जाओगे जिस तरह ठहरा हुआ पानी खराब हो जाता है। बालक को यह बातें अच्छी लगीं और ठहरकर वो इस पर विचार करने लगा। उसके चिंतन करने से उसका खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया। उसने ठान लिया कि वह निराश नहीं होगा और जीवन में आगे बढ़ेगा। यह सोचकर वो वापस घर की ओर मुड़ा। फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यही बालक बड़ा होकर अपने देश वियतनाम का राष्ट्र नायक बना, उसका नाम हो ची मिन्ह था।

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