मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक: बुराई के खिलाफ प्रयास

किस्सों का सबक: बुराई के खिलाफ प्रयास

डॉ. दीनदयाल मुरारका
काशी में एक पंडित रहा करते थे। उनकी धार्मिक पुस्तकों की एक छोटी सी दुकान थी। उसी की कमाई से वे परिवार का खर्च चलाते थे। जिस जगह पंडित जी रहते थे वहां एक ऐसा व्यक्ति था, जो पंडित जी से सबसे ज्यादा पुस्तकें खरीदता था। वह उधार भी नहीं लेता था। किताबों के मूल्य वह उसी समय चुका देता था। एक बार पंडित जी किसी काम से बाहर गए हुए थे। उस दिन दुकान पर उनका नौकर था। उस व्यक्ति ने हमेशा की तरह उस दिन भी कुछ किताबें खरीदी और जब वह कीमत देने लगा तो उसमें कुछ सिक्के खोटे थे।
नौकर ने उस आदमी को भला-बुरा कहा और बोला, ‘यह खोटे सिक्के आप वापस ले लो।’ दूसरे दिन पंडित जी जब वापस लौटे तो नौकर ने उन्हें खोटे सिक्के की बात बताई और कहा, ‘उसने उस व्यक्ति को वे सिक्के वापस कर दिए।’ पंडित जी बोले, ‘तुमने ठीक नहीं किया। तुम्हें उस सिक्के को वापस नहीं करना चाहिए था।’ नौकर बोला, ‘मालिक, आप क्या कह रहे हैं। मैंने तो आपके भले के लिए नकली सिक्कों को वापस कर दिया था। यदि मैंने रख लिए होते तो आप मुझ पर नाराज होते।’ पंडित जी मुस्कुराकर बोले, ‘बेटा तुम्हारी वफादारी पर मुझे कोई शक नहीं है। लेकिन तुम नहीं जानते, वह आदमी मुझे हमेशा ही कुछ खोटे सिक्के देते रहता था। मैं उन सिक्कों को लेकर जमीन में गाड़ देता हूं।’
नौकर ने आश्चर्य से पूछा, ‘लेकिन आप ऐसा क्यों करते हैं?’ पंडित जी बोले, ‘यह उसका स्वभाव है। अपनी आदत से वह बाज तो आएगा नहीं। यदि मैं उसके सिक्कों को नहीं लूंगा तो वह कहीं दूसरी जगह देगा। मैं उससे वह सिक्के लेकर जमीन में गाड़ देता हूं, ताकि किसी अन्य के हाथ लगकर फिर चलन में न आ सके।’ नौकर बोला, ‘मालिक आपके अकेले ऐसा करने से क्या खोटे सिक्के का चलन बंद हो जाएगा?’ पंडित जी ने कहा, ‘बंद हो या ना हो पर किसी गलत चीज के खिलाफ कोशिश हर समय जारी रहनी चाहिए।’

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