मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : विद्रोह की आवाज

किस्सों का सबक : विद्रोह की आवाज

डॉ. दीनदयाल मुरारका
बात उन दिनों की है जब डॉ. राममनोहर लोहिया जर्मनी के हंबोल्ट विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी कर रहे थे। भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आंदोलन जोरों पर था। लोहिया जी के पिता हीरालाल जी भी स्वाधीनता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे।
पिता, पुलिस के अत्याचारों की सूचना, पत्र द्वारा अपने पुत्र को देते रहते थे, जिन्हें पढ़कर लोहिया जी के हृदय में अंग्रेजी शासन के प्रति गुस्से की भावना प्रबल हो उठती थी। इसी समय जिनेवा में लीग ऑफ नेशंस का अधिवेशन होने जा रहा था, जिसमें भारत का प्रतिनिधित्व बीकानेर के महाराजा कर रहे थे। बहुत कोशिशों के बाद लोहिया जी ने इस अधिवेशन की दर्शक दीर्घा में बैठने के दो पास हासिल कर लिए और अपने एक भारतीय मित्र के साथ दर्शक दीर्घा में जा बैठे।
बीकानेर के महाराजा का भाषण भारत में अंग्रेजी शासन की प्रशंसा और चापलूसी भरा था। भाषण के दौरान लोहिया जी ने अपने मित्र के साथ खूब सीटी बजाई एवं हूटिंग की। अध्यक्ष ने तुरंत उन्हें बाहर निकालने का आदेश दिया। अगले दिन समाचार पत्रों में लोहिया द्वारा सभापति को लिखा हुआ एक पत्र छपा, जिसमें उन्होंने भारत में हो रहे अंग्रेजों के अत्याचार की विस्तार में चर्चा कर भारतीय प्रतिनिधि के भाषण की धज्जियां उड़ाई थीं।
जब किसी ने उनसे इस विषय पर पूछा। तो उनका जवाब था कि मेरा मकसद दुनिया के सामने भारत में चल रहे अन्याय पूर्ण अंग्रेजी शासन की पोल खोलना था, जो मैंने कर दिखाया। हमें जो आजादी मिली है, वाकई मैं कई देशभक्तों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।

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