आओ चलें गांव

ऐसे तमाम चीजें देखें
जो शहरों में नहीं हैं
बैलों के कंधो पे हल
किसानों के कंधों पे धूप की पगड़ी…

सब मौजूद हैं, अंगड़ाइयां भरी फसलें
मां के दो-चार थप्पड़…
जब मां बुलाती है प्यार से, ये आवारा सुन…
आओ लौट चलें,
अपना गांव देखें, तालाबों की हिचकियां…
मछलियों का रक्स…!

चलो घूम आएं अपने बागों में
अमुआ से तकरार करें
खिजों से आंख मिला आये
कैसे गेहूं की लटे,
सावन की घटाओं में धुल रही है,
देखें…, छम- छम करती बारिश।

किसानों की कैसे मदद करती हैं
वो फूस का छप्पर
उदास पानी,
दादा जी से कैसे बातें करता है

रक्स-नाच। खिजां-पतझड़।

मनोज कुमार
गोंडा उत्तर प्रदेश

अन्य समाचार