मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाझील पर तैरता जीवन! बोटहाउस में रहता है पाकिस्तान का एक गांव

झील पर तैरता जीवन! बोटहाउस में रहता है पाकिस्तान का एक गांव

मनमोहन सिंह

अनवर अपने ८ साल के बड़े भाई के साथ बांस से बने हुए एक झूले पर लेट गया, उसके दादा झुला-झूलाते बताने लगे कि उनके अब्बू ४ साल की उम्र में मछली पकड़ने उनके साथ जाते थे और एक बार डूबते-डूबते बचे।

५ साल का अनवर अपने अब्बू के साथ मछली पकड़कर वापस लौटा है। उसके साथ उसके चार भाई भी हैं, उनकी उम्र है १२ से ८ के बीच। अनवर सबसे छोटा है। आज वह पहली बार अपने अब्बू और भाइयों के साथ मछली पकड़ने गया था एक छोटे से डोंगे में। उसके चेहरे पर एक मासूम खुशी झलक रही है। वह अपनी अम्मी को बताता है कि उसने आज मछलियां कैसे पकड़ीं। उसके दूसरे भाई अम्मी को हंसते हुए बताते हैं कि वह किस तरह से मछली पकड़ने की कोशिश कर रहा था और वह बता रहे थे कि जैसे ही अब्बू मछलियां टोकरी में रख रहे थे, अनवर उन्हें हाथों से पकड़ने की कोशिश कर रहा था और मछलियां उसके हाथों से फिसलकर पानी में जा रही थीं। उसकी दादी ने उसे कसकर गले लगा लिया। उसकी बलैयां लेते हुए कहने लगी अल्लाह इसे बरकत दे और बुरी नजर से बचाए। अब उसकी अम्मी और दादी ने किचन संभाल लिया था।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील मंचर के हल्के नीले पानी पर तैरते हुए एक बोटहाउस में यह परिवार अब खाने की तैयारी कर रहा है। नावों पर रहते इन्हें कई सौ साल बीत गए हैं। झील के बीच में लंगर डाले कुछ दर्जन नावों के समूह सदियों पुराने मोहना या मल्लाह समुदाय के हैं। यह झील पर बसा हुआ एक गांव है। मछली पकड़ना इनका मुख्य व्यवसाय है। किसी जमाने में इनकी आबादी ५०,००० के करीब थी, लेकिन तीन दशकों से भी कम समय में इनकी आबादी घट कर केवल ४५० रह गई है। मल्लाह वंश की एक शाखा के समृद्ध शेख समुदाय से जुड़े इस तैरते हुए गांव के मुखिया यूसुफ के अनुसार, ‘झील का पानी हमारे लिए सब कुछ है, लेकिन मुख्य रूप से आय का एकमात्र स्रोत है। अब मुख्य रूप से बच्चों में आंखों और चमड़ी की बीमारी और डायरिया, गैस्ट्रोएंटेराइटिस जैसी बीमारियों की तादाद बढ़ रही है, क्योंकि गरीबी के चलते कभी-कभी यहां के निवासियों को झील का पानी ही पीना पड़ता है। मंचर झील दक्षिणी सिंध के ऊपरी हिस्सों और दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान के कुछ इलाकों से निकलनेवाले औद्योगिक कचरे का डंपिंग ग्राउंड बन गई है, जिससे पानी पर निर्भर लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया है। कम वर्षा के कारण जलस्तर में गिरावट और सिंधु नदी पर बैराज और बांधों के निर्माण के कारण एक प्रचुर मात्रा में मछली भंडार धीरे-धीरे कम हो गया है। २०० साल पुराने इस गांव में केवल ४५ नावें बची हैं। आर्थिक समस्या से जूझते कई परिवार अब इस तैरते गांव को छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में पाकिस्तान के कई इलाकों में चले गए हैं, क्योंकि हाल के वर्षों में मछली पकड़ने के व्यवसाय में कमी के कारण वे अपनी नावों की मरम्मत का खर्च वहन नहीं कर सके। एक नाव की कीमत तकरीबन १३ से १४ लाख पाकिस्तानी रुपए है। हालांकि, सरकार और कुछ गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा इन लोगों को सोलर पैनल दिए गए हैं, जिनकी वजह से अब उन्हें बिजली मिल जाती है। परेशानी तो यह है कि आज भी उन्हें खाने-पीने की चीज यानी नून तेल से लेकर पीने का पानी सब खरीदकर ही लाना पड़ता है और सरकार को इस खत्म होते समुदाय की कोई चिंता नहीं है।

सिंधु नदी के पश्चिम में स्थित और २५० वर्ग किलोमीटर में फैली मंचर एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक है। २.५ से ३.७५ मीटर के बीच औसत गहराई के साथ, झील बेहतर मानसून के मौसम के दौरान ५०० वर्ग किलोमीटर तक फैल सकती है।

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