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बच्चों को जीवन का वरदान! …बांग्लादेशी डॉक्टर ने प्लास्टिक की खाली बोतलों से बनाया लाइफ सेविंग डिवाइस

मनमोहन सिंह
डॉ. मोहम्मद जोब्यार चिश्ती के हाथों में एक प्लास्टिक की खाली बोतल थी। वो एक शैंपू की खाली बोतल थी, जो उन्हें अस्पताल के आईसीयू यूनिट में मिली। वे उसे बार-बार गौर से देख रहे थे। उन्होंने बोतल को पानी से भर दिया और फिर उसमें एक प्लास्टिक की ट्यूब घुसा दी। उनके चेहरे पर चमक आ गई क्योंकि उन्हें बबल सीपीएपी यानी कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवेज प्रेशर का देसी जुगाड़ मिल गया था। यह मशीन निमोनिया से पीड़ित फेफड़ों को खत्म होने से बचाती है। इसके जरिए फेफड़े काफी मात्रा में ऑक्सीजन शोषित करने में सफल होते हैं। उन्होंने इस तरह की लाइफ सेविंग मशीन ऑस्ट्रेलिया में देखी थी, जब वो वहां पर काम कर रहे थे। यह मशीन बहुत महंगी होने की वजह से बांग्लादेश जैसे गरीब देश में आम लोगों की पहुंच के बाहर है।
अस्पतालों की तस्वीर बदल गई
इस वक्त डॉक्टर चिश्ती बांग्लादेश के इंटरनेशनल सेंटर फॉर डायरियल डिजीज रिसर्च में बबल सीपीएपी बनाने में जुटे हुए थे। आखिर उनकी मेहनत रंग लाई। देसी बबल सीपीएपी उनके हाथ में था। उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ बच्चों की आईसीयू यूनिट में इसका परीक्षण किया तो नतीजे बिल्कुल वैसे ही थे, जैसा वो चाहते थे। इस चमत्कारी खोज ने बांग्लादेश के कई अस्पतालों की तस्वीर बदल दी। निमोनिया से पीड़ित छोटे बच्चों को यह तकनीक वरदान बन चुकी है। डॉ. चिश्ती बताते हैं कि यह बबल सीपीएपी कैसे काम करता है। बच्चे एक टैंक से ऑक्सीजन लेते हैं और एक ट्यूब के माध्यम से सांस छोड़ते हैं। इसे पानी की बोतल में डाला जाता है, जिससे पानी में बुलबुले पैदा होते हैं। बुलबुलों का दबाव फेफड़ों की छोटी हवा की थैलियों को खुला रखता है।
१० वर्षों की मेहनत सफल हुई
सन १९९६ में जब डॉक्टर चिश्ती बांग्लादेश के एक अस्पताल से जुड़े थे। उनके सामने ही इस उपकरण के अभाव में कई बच्चों ने दम तोड़ दिया था। उसी वक्त डॉक्टर ने ऐसे बच्चों की जिंदगी बचाने की ठान ली थी। तकरीबन १० साल के बाद उन्होंने यह लाइफ सेविंग डिवाइस तैयार कर लिया था, तब से लेकर आज तक यह बच्चों की जिंदगी को रोशन करता आ रहा है। उनकी बबल सीपीएपी डिवाइस लाइफ सेविंग डिवाइस के रूप में अंतर्राष्ट्रीय तौर पर पहचान बन चुकी है।

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