जिंदगी!

क्या-क्या दिखा रही है जिंदगी
बस तुझे याद किए जा रहा हूं जिंदगी
थोड़ी खट्टी, थोड़ी मीठी-सी है जिंदगी
बस तुझे याद किए जा रहे हैं जिंदगी
कब सीमा तोड़ दे जिंदगीr पता नहीं
थोड़ा सीमांतर में रहना सीख लो जिंदगी
किसी के भटकावे में मत आओ जिंदगी
उम्र का क्या पता कब छोड़ दे जिंदगीr
हम न जाने किस-किस मोड़ से गुजर रहे हैं
जिंदगी अब खुद की गिनती कर रहे हैं
अब हमें भी हिसाब देना पड़ रहा है जिंदगी
उम्र गुजार रहे हैं दिन गिन-गिनकर जिंदगी
ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे कई वर्ष गुजर गए हैं
हाल मत पूछ जिंदगी धीरे-धीरे उम्र गुजर गए हैं
जो चल रहा है चलने दो जिंदगी उम्र क्या है
चुपके से निकल जाती हो बिन बताए ये क्या है
इतनी भी बेईमानी मत करो जीने भी दो जिंदगी
हम तो सोचते थे इतना आसान हो जिंदगी
यहां पर एक-एक पल गुजारना भारी पड़ रहा है
फिर भी जिए जा रहे हैं राह भारी पड़ रहा है
इतना झूठ मत बोला करो जिंदगी सहन न हो पाए
जिंदगी कुछ तो खयाल कर खुद के न हो पाएं
यहां खुद झूठ बोल-बोलकर थक से गए हैं
खुद अपनी वफा की तारीफ करते से गए हैं।
-जयप्रकाश सोनकर,
मऊ (उत्तर प्रदेश)

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