मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका: द्विवेदीयुगीन सरस वर्णन के कवि, गुरु भक्तसिंह ‘भक्त’

साहित्य शलाका: द्विवेदीयुगीन सरस वर्णन के कवि, गुरु भक्तसिंह ‘भक्त’

डॉ. दयानंद तिवारी

गुरु भक्तसिंह ‘भक्त’ का जन्म ७ अगस्त, १८९३ को गाजीपुर जमानियां तहसील के शासकीय औषधालय में हुआ। पिता ठाकुर कालिका प्रसाद सिंह पृथ्वीराज चौहान के वंशज, सहायक सर्जन एवं सुशिक्षित अरबी-फारसी प्रेमी परिवार के काव्यानुरागी सहृदय व्यक्ति थे। भक्तसिंह ने बी.ए तथा एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की थी।

गुरु भक्तसिंह छायावादी अमूर्तता एवं वैयक्तिकता से परे अवरोधपूर्ण अनुभूतियों के सहज प्रसारक एवं तत्कालीन काव्य-विषय को नूतन अर्थभूमि प्रदान करनेवाले प्राकृत स्वच्छंदतावादी कवि थे। गुरु भक्तसिंह ने द्विवेदीयुगीन इतिवृत्तात्मकता को सरस वर्णन सौंदर्य, आदर्शवाद को मानवीय यथार्थ की मनोदृष्टि, प्रकृति संकोच को नूतन विस्तार एवं भाषा की गद्यात्मक रुक्षता को तरल प्रवाह एवं मुहावरों को जीवंत मधुरिता प्रदान की है।

रचनाएं- भक्तसिंह जी की ‘सरस सुमन’, ‘कुसुम कुंज’, ‘वंशी-ध्वनि’, ‘वन श्री’, ‘नूरजहां’ एवं ‘विक्रमादित्य’ उनकी प्रकाशित रचनाएं हैं।
उपन्यास- ‘प्रेम पाश’, ‘रधिया’, ‘वे दोनों’, ‘नूरजहां’, ‘प्रसद वन एवं आत्मकथा’, ‘जीवन की झांकियां’, ‘कुसुमाकर’ अप्रकाशित रचनाएं हैं।

काव्य संग्रह- ‘सरस सुमन’, ‘कुसुम कुंज’, ‘वंशी-ध्वनि’ एवं ‘वन श्री’ स्फुर कविताओं के संग्रह हैं। ये कविताएं ग्रामीण प्रकृति, ग्राम्य जीवन एवं वन, पुष्प और पक्षियों से संबद्ध अपने समय में काव्य के व्यापक वस्तु-विषय तथा शेष सृष्टि के प्रति नवीन राग-विस्तार का संकेत हैं। प्रकृति के प्रति आत्मीयता ग्राम्य-जीवन रूपों के आत्मस्पर्श और अपरिचित, उपेक्षित निसर्ग-पक्षों के सरस विवरणों से युक्त इन रचना के कारण इन्हें ‘हिंदी का वर्ड्सवर्थ’ कहा गया है। ‘नूरजहां’ इतिहास प्रसिद्ध नूरजहां पर लिखित महाकाव्य के रूप में विख्यात ललित प्रबंध है। ‘विक्रमादित्य’ भारतीय इतिहास के स्वर्णकाल से संबद्ध छठी शती के संस्कृत नाटककार विशाखदत्त के ‘देवी चंद्रगुप्त’ नाटक के सुप्रसिद्ध अंश पर आधारित उनका द्वितीय महाकाव्य है। ‘भक्तजी’ ने शोध, अध्यवसाय एवं विधायक कल्पना द्वारा इस प्रबंध को ‘नूरजहां’ से ही आगे ले जाकर जीवन की गहनतर विशालता में पैâला दिया है। तत्कालीन इतिहास इस प्रबंध में पुनर्जीवित होकर अंतर्बाह्य चित्रण की विविधता, जीवन प्रश्नों की गंभीर सूक्ष्मता, चरित्रांकन की यथार्थता एवं भाषा प्रांजलता की विशेषताओं के साथ नाटकीय संघर्ष की गति पाकर मूर्तिमान हो उठा है।

भक्तजी का हिंदी के अलावा उर्दू, फारसी, अंग्रेजी पर भी जबरदस्त अधिकार था। उर्दू में कविताएं लिखीं। अंग्रेजी में भी कविताएं लिखीं। ‘नूरजहां का अंग्रेजी में छंदोबद्ध अनुवाद भी खुद ही किया। इन भाषाओं पर अधिकार के बावजूद हिंदी से उन्हें बेहद लगाव था और मुख्य रचनाएं हिंदी में ही लिखीं।’ भक्तजी ने अपने करियर की शुरुआत वकालत से की। बलिया में १९१९ से १९२२ तक वकालत की। इसके बाद गांधीजी के आह्वान पर वकालत छोड़ दी। बाद में १९ नवंबर, १९२२ से १९२५ तक बंगाल नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे में टैप्रिâक इंस्पेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं दीं। बलिया में रहते हुए उनका दूसरा नाटक ‘तसनीम आया। इस दौरान कविता भी लिखते रहे। १९२५ में पहला काव्य संग्रह ‘सरस सुमन’ का प्रकाशन हुआ। भक्तजी ने फिर अपनी नौकरी बदली। वे गाजीपुर में जिला बोर्ड में सेक्रेटरी हो गए। यहां भी वे दो साल यानी १९२५ से १९२७ तक रहे। इसके बाद इलाहाबाद के मांडा रियासत में मैनेजर हो गए। एक साल तक ही यहां रह पाए कि फिर रायबरेली के जिला बोर्ड में सेक्रेटरी हो गए। यहां से फिर १९३२ में बाराबंकी के रामनगर इस्टेट में मैनेजर हो गए। इसके बाद एटा जिले के अवागढ़ रियासत में भी मैनेजर रहे। यहां उन्हें तीन सौ रुपए मासिक वेतन मिलता था। सबसे लंबी नौकरी आजमगढ़ में की और यही उनकी अंतिम नौकरी भी थी। यहां वे १९३५ से लेकर १९५६, अवकाश प्राप्ति तक म्युनिसिपल बोर्ड के सेक्रेटरी रहे। यहीं पर अपना आवास बनवाया अलवल मुहल्ले में भक्त भवन। कोट, पैंट, टाई पर रंगदार और धारीदार राजस्थानी मुरेठा इनकी वेशभूषा थी।

भाषा शैली- ‘भक्तसिंह’ ने द्विवेदीयुगीन इतिवृत्तात्मकता को सरस वर्णन सौंदर्य, आदर्शवाद को मानवीय यथार्थ की मनोदृष्टि, प्रकृति संकोच को नूतन विस्तार एवं भाषा की गद्यात्मक रुक्षता को तरल प्रवाह एवं मुहावरों को जीवंत मधुरिता प्रदान की है। ये छायावादी अमूर्तता एवं वैयक्तिकता से परे अपरोध अनुभूतियों के सहज प्रसारक एवं तत्कालीन काव्य-विषय को नूतन अर्थ भूमि प्रदान करनेवाले प्राकृत स्वच्छंदतावादी कवि थे। इनके प्रयास से छायावादी काव्य एक नवीन मोड़ लेता है। वे सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद के विद्वानों में से एक थे, जिसमें डॉ. अमरनाथ झा जैसे दिग्गज शामिल थे। गुरु भक्तसिंह ने विभिन्न विषयों पर विचार किया और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं और वस्तुओं पर लिखा। वर्ष १९२५ में जब गुरु भक्तसिंह ‘भक्त’ की पहली काव्य कृति ‘सरस सुमन’ नागरी प्रचारिणी सभा बलिया के प्रयासों से प्रकाशित हुई तो उनकी प्रतिभा से हिंदी जगत चकाचौंध हो गया और रातों-रात उन्हें कवि घोषित कर दिया गया। पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने उन्हें हिंदी में नेचर स्कूल का संस्थापक घोषित किया और प्रख्यात विद्वान डॉ. अमरनाथ झा ने उनमें वर्ड्सवर्थ की प्रतिभा, हाफिज की मिठास और गोल्डस्मिथ की जीवंतता देखी। उनकी कविताओं का एक संग्रह, ज्यादातर प्रकृति पर, बाद में ‘कुसुम कुंज’ और ‘बंसी ध्वनि’ के रूप में प्रकाशित हुआ। १९३५ में नाटकीय काव्य कृति नूरजहां को व्यापक प्रशंसा के साथ प्रकाशित किया गया था। बाद में इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। ठाकुर गुरु भक्तसिंह ने अपने लिए एक अद्वितीय स्थान हासिल किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दिवंगत कुलपति डॉ. अमरनाथ झा ने उन्हें ‘हिंदी कविता का वर्ड्सवर्थ’ कहा था।

१९४८ में उनका दूसरा महाकाव्य विक्रमादित्य प्रकाशित हुआ। पद्य में एक नाटकीय कृति, जो विद्वता और अनुसंधान की छाप रखती है और विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर अध्ययन में इसके समावेश ने इसकी उत्कृष्टता की पहचान पर मुहर लगा दी है। उनके बेटे अरविंद सिंह ने बाद में अपने पिता का काम संभाला और उस पर एक किताब लिखी। ३० मई, २००४ को उनकी मृत्यु के कारण, पुस्तक अप्रकाशित है। केवल ३ प्रतियां ही बनाई गर्इं।

उनकी एक कविता इस प्रकार है, जिसे पढ़कर इनके काव्य पाठ का पता लगाया जा सकता है।

ओ स्वप्नों के संसार विदा, ओ बालकपन के प्यार विदा।
ओ शोभा के आगार विदा, मनमोहन के मनुहार विदा।।
यमुना का कल-कल नाद विदा, आंखों का वह उन्माद विदा।
आमोदों का प्रासाद विदा, वह जीवन का आह्लाद विदा।।
उस मधुर कल्पना-शिल्पी के, महलों का माया-जाल विदा।
उस मेरे हृदय सरोवर का, ओ सुंदर सुखद मराल विदा।।
कौमार्य-कली के कलित कामनाओं का, मौन विकास विदा।
वह दिनकर संगम से प्राची में, ऊषा का मृदुहास विदा।।
ओ अनिल-नींव-पर-बने हुए, अभिलाषाओं के कोट विदा।
ओ क्रूर काल के कठिन करों के, अंतस्तल की चोट विदा।।
हिम सरिता में बहते विलास, विनिमय सुख के हिमखंड विदा।
आकांक्षाओं के झंझा के, झकझोर झपेट प्रचंड विदा।।
चिरपरिचित हृदय देश अपनाने का, वह विजयोल्लास विदा।
उस प्यारे शिशु के गिर-गिर पैरों चलने का अभ्यास विदा।।

अपनी कविताओं और विषय के बारे खुद भक्त ने अपनी कैफियत दी है, ‘मेरी कविता का विषय रहा है मानव और मन तथा विविध परिस्थितियों में उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया। साधारण और उपेक्षित की ओर भी मेरा विशेष ध्यान गया, चाहे वह जड़ हो या चेतन। विशिष्ट की ओर ही अभी तक साहित्य का स्रोत बहता था और देवी-देवता, राजारानी नायक-नायिका बनकर मंच पर आते रहे थे। भारतीय जन-जीवन का शुद्ध रूप हम शत-प्रतिशत ग्रामीण जनों में पाते हैं। ये बेचारे विशेषत: उपेक्षित हैं। बुद्धिजीवी नागरिक तथा पाश्चात्य कृत्रिम चमक-दमक की चकाचौंध के पुजारी पतंगे चाहे इन्हें असभ्य और प्रस्तरमूर्ति ही समझते रहे हों, परंतु वस्तुत: यही भारतीय जनजीवन के प्रतीक हैं। ये आधुनिक दयहीन दिखावटी सभ्यता के कलपुर्जे नहीं हैं। वे ही तो धर्म शून्य, हमारे सनातन धर्म मर्यादा तथा सांस्कृतिक संस्कारों के रक्षक देवता हैं। दय मौज मारता है। इन दीनों की दुर्बल काया में एक उदार स्नेहासिक्त मैं उनको अपनाया, उनको गले लगाया, इनकी प्रतिमाओं की, कविता द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा कर उनकी पूजा की। उन पर स्नेह के फूल चढ़ाए। ऐसे पात्र मेरे सभी संग्रहों में आए हैं।’

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