मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : ब्रजभाषा काव्य परंपरा के प्रौढ़ कवि राय देवीप्रसाद पूर्ण

साहित्य शलाका : ब्रजभाषा काव्य परंपरा के प्रौढ़ कवि राय देवीप्रसाद पूर्ण

डॉ. दयानंद तिवारी

द्विवेदीजी के प्रभाव से हिंदी काव्य ने जो स्वरूप प्राप्त किया, उसके अतिरिक्त और अनेक रूपों में भी भिन्न-भिन्न कवियों की काव्यधारा चलती रही। कई एक बहुत अच्छे कवि अपने-अपने ढंग पर सरस और प्रभावपूर्ण कविता करते रहे, जिनमें मुख्य राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’, पं. नाथूरामशंकर शर्मा, पं. गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, पं. सत्यनारायण कविरत्न, लाला भगवानदीन, पं. रामनरेश त्रिपाठी, पं. रूपनारायण पांडेय आदि। इन कवियों में से अधिकांश तो दोरंगी कवि थे, जो ब्रजभाषा में तो शृंगार, वीर, भक्ति आदि की पुरानी परिपाटी की कविता कवित्त-सवैयों या गेय पदों में करते आते थे और खड़ी बोली में नूतन विषयों को लेकर चलते थे। बात यह थी कि खड़ी बोली का प्रचार बराबर बढ़ता दिखाई पड़ता था और काव्य के प्रवाह के लिए कुछ नई-नई भूमियां भी दिखाई पड़ती थीं। देश दशा, समाज दशा, स्वदेश प्रेम, आचरण संबंधी उपदेश आदि नई धारा की कविता न रहकर जीवन के कुछ और पक्षों की ओर भी बढ़ी, पर गहराई के साथ नहीं। त्याग, वीरता, उदारता, सहिष्णुता इत्यादि के अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंग पद्यबद्ध हुए, जिनके बीच-बीच में जन्मभूमि प्रेम, स्वजाति गौरव आत्मसम्मान की व्यंजना करनेवाले जोशीले भाषण रखे गए। जीवन की गूढ़, मार्मिक या रमणीय प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ी। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने कुछ ध्यान कल्पित प्रबंध की ओर दिया।
उक्त दार्शनिकता का पुट राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’ की रचनाओं में दिखाई पड़ता है, पर किसी दार्शनिक तथ्य को हृदयग्राह्य रसात्मक रूप देने का प्रयास उनमें भी नहीं पाया जाता। उनके ‘वसंतवियोग’ में भारतदशासूचक प्राकृतिक विभूति के नाना चित्रों के बीच-बीच में कुछ दार्शनिक तत्व रखे गए हैं और अंत में आकाशवाणी द्वारा भारत के कल्याण के लिए कर्मयोग और भक्ति का उपदेश दिलाया गया है। प्रकृति वर्णन की ओर हमारा काव्य कुछ अधिक अग्रसर हुआ पर प्राय: वहीं तक रहा, जहां तक उसका संबंध मनुष्य के सुख सौंदर्य की भावना से है। प्रकृति के जिन सामान्य रूपों के बीच नरजीवन का विकास हुआ है, जिन रूपों से हम बराबर घिरे रहते आए हैं उनके प्रति वह राग या ममता न व्यक्त हुई, जो चिर सहचरों के प्रति स्वभावत: हुआ करती है। प्रकृति के प्राय: वे ही चटकीले-भड़कीले रूप लिए गए, जो सजावट के काम के समझे गए।
राय देवीप्रसाद पूर्ण का उल्लेख ‘पुरानी धारा’ के भीतर हो चुका है। वे ब्रजभाषा काव्य परंपरा के बहुत ही प्रौढ़ कवि थे और जब तक जीवित रहे, अपने ‘रसिक समाज’ द्वारा उस परंपरा की पूरी चहल-पहल बनाए रहे। उक्त समाज की ओर से ‘रसिक वाटिका’ नाम की एक पत्रिका निकली थी, जिसमें उस समय के प्राय: सब ब्रजभाषा कवियों की सुंदर रचनाएं छपती थीं। जब संवत् १९७७ में पूर्ण जी का देहावसान हुआ, उस समय उक्त समाज निरवलंब सा हो गया-
रसिक समाजी ह्वै चकोर चहुं ओर हेरैं,
कविता को पूरन कलानिधि कितै गयो। (रतनेश)
पूर्ण जी सनातन धर्म के बड़े उत्साही अनुयायी तथा अध्ययनशील व्यक्ति थे। उपनिषद और वेदांत में उनकी अच्छी पकड़ थी। सभा समाजों के प्रति उनका बहुत उत्साह रहता था और उसके अधिवेशनों में वे अवश्य कोई-न-कोई कविता पढ़ते थे। देश में चलनेवाले आंदोलनों (जैसे, स्वदेशी) को भी उनकी वाणी प्रतिध्वनित करती थी। भारतेंदु, प्रेमघन आदि प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्ण जी में भी देशभक्ति और राजभक्ति का समन्वय पाया जाता है। बात यह है कि उस समय तक देश के राजनीतिक प्रयत्नों में अवरोध या विरोध का बल नहीं आया था और लोगों की पूरी तरह धड़क नहीं खुली थी। अत: उनकी रचना में यदि एक ओर ‘स्वदेशी’ पर देशभक्ति पूर्ण पद्य मिले और दूसरी ओर सन् १९११ वाले दिल्ली दरबार के ठाट-बाट का वर्णन तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्ण जी पहले नूतन विषयों की कविता भी ब्रजभाषा में करते थे, जिस पर आलोचकों का ध्यान नहीं गया यहां उनके साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ है-
विगत आलस की रजनी भई। रुचिर उद्यम की द्युति छै गई
उदित सूरज है नव भाग को। अरुन रंग भये अनुराग को
तजि बिछौनन को अब भागिए। भरत खंड प्रजागण जागिए।।
इस प्रकार ‘संग्रामनिंदा’ आदि अनेक विषयों पर उनकी रचनाएं ब्रजभाषा में ही हैं। पीछे खड़ी बोली की कविता का प्रचार बढ़ने पर बहुत सी रचना उन्होंने खड़ी बोली में भी की, जैसे ‘अमलतास’, ‘वसंतवियोग’, ‘स्वदेशी कुंडल’, ‘नए सन् (१९१०) का स्वागत’, ‘नवीन संवत्सर (१९६७) का स्वागत’ इत्यादि। ‘स्वदेशी’, ‘देशोद्धार’ आदि पर उनकी अधिकांश रचनाएं इतिवृत्तात्मक पद्यों के रूप में हैं। ‘वसंतवियोग’ बहुत बड़ी कविता है, जिसमें कल्पना अधिक सचेष्ट मिलती है। उसमें भारतभूमि की कल्पना एक उद्यान के रूप में की गई है। प्राचीनकाल में यह उद्यान सत्वगुणप्रधान तथा प्रकृति की सारी विभूतियों से संपन्न था और इसके माली देवतुल्य थे। पीछे मालियों के प्रमाद और अनैक्य से उद्यान उजड़ने लगता है। यद्यपि कुछ यशस्वी महापुरुष (विक्रमादित्य ऐसे) कुछ काल के लिए उसे संभालते दिखाई पड़ते हैं, पर उसकी दशा गिरती ही जाती है। अंत में उसके माली साधना और तपस्या के लिए वैâलास मानसरोवर की ओर जाते हैं, जहां आकाशवाणी होती है कि विक्रम की बीसवीं शताब्दी में जब ‘पच्छिमी शासन’ होगा तब उन्नति का आयोजन होगा। ‘अमलतास’ नाम की छोटी-सी कविता में कवि ने अपने प्रकृति निरीक्षण का भी परिचय दिया है। ग्रीष्म में जब वनस्थली के सारे पेड़-पौधे झुलसे से रहते हैं और कहीं प्रफुल्लता नहीं दिखाई देती है, उस समय अमलतास चारों ओर फूलकर अपनी पीतप्रभा पैâला देता है। इससे कवि भक्ति के महत्व का संकेत ग्रहण करता है कि-
देख तव वैभव, द्रुमकुल संत! बिचारा उसका सुखद निदान।
करे जो विषम काल को मंद, गया उस सामग्री पर ध्यान
रंगा निज प्रभु ऋतुपति के रंग, द्रुमों में अमलतास तू भक्त।
इसी कारण निदाघ प्रतिकूल, दहन में तेरे रहा अशक्त
पूर्ण जी की कविताओं का संग्रह ‘पूर्ण संग्रह’ के नाम से प्रकाशित हो चुका है। उनकी खड़ी बोली की रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए हैं-
नंदन वन का सुना नहीं है किसने नाम।
मिलता है जिसमें देवों को भी आराम
उसके भी वासी सुखरासी, उग्र हुआ यदि उनका भाग।
आकर के इस कुसुमाकर में, करते हैं नंदन रुचि त्याग
है उत्तर में कोट शैल सम तुंग विशाल।
विमल सघन हिमवलित ललित धावलित सब काल
हे नरदक्षिण! इसके दक्षिण-पश्चिम, पूर्व।
है अपार जल से परिपूरित कोश अपूर्व
पवन देवता गगन पंथ से सुघन घटों में लाकरनीर।
सींचा करते हैं यह उपवन करके सदा कृपागंभीर
कर देते हैं बाहर भुनगों का परिवार।
वसंतवियोग में वे लिखते हैं कि-
सरकारी कानून का रखकर पूरा ध्यान।
कर सकते हो देश का सभी तरह कल्यान
सभी तरह कल्यान देश का कर सकते हो।
करके कुछ उद्योग सोग सब हर सकते हो
जो हो तुममें जान, आपदा भारी सारी।
हो सकती है दूर, नहीं बाधा सरकारी।।
रायदेवी प्रसाद पूर्ण राष्ट्रीय का काव्यधरा के सशक्त कवि थे। हिंदी साहित्य में पूर्ण जी की ख्याति ब्रजभाषा काव्य परंपरा के अत्यंत प्रौढ़ और सिद्ध कवि के रूप में भी हैं।
(समाप्त)

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