मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिसाहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक हैं : प्रो. पाठक

साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक हैं : प्रो. पाठक

सामना संवाददाता / मुंबई
साहित्य और पत्रकारिता भाषा संचार करती है। ये एक-दूसरे से अलग नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। उक्त उद्गार दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई एवं नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय, प्रयागराज के पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) राममोहन पाठक ने हिंदी-विभाग के.सी. महाविद्यालय द्वारा अगस्त क्रांति दिवस पर आयोजित ‘हिंदी साहित्य और पत्रकारिता’ विषयक विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। प्रो. पाठक ने कहा कि पत्रकारिता के प्रारंभिक दौर को देखें तो जो साहित्यकार थे, वही पत्रकार भी थे। इनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र, राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद आदि प्रमुख हैं। हमें इस बात को समझना होगा कि सूचना पत्र से जो जानकारी मिलती है और उसे कथा रूप में ले जाने का कार्य साहित्य करता है, इसलिए साहित्य और समाचार पत्र एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं। ये दोनों के सहगामी और पूरक हैं। ये दोनों समवेत रूप से भाषा, संस्कृति एवं समाज का संस्कार करते हैं। इसी क्रम में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष प्रो (डॉ.) शीतला प्रसाद दुबे ने कहा कि आज पत्रकारिता एवं साहित्य की पहुंच बड़ी ही व्यापक एवं सुलभ हो गई है। ये दोनों एक-दूसरे के सहयोगी के रूप में हमारे सामने उपलब्ध हैं। आज हर कोई अपनी सूचनाओं को समाचार अथवा भावनाओं को साहित्य के रूप में सामाजिक माध्यमों की मदद से आसानी से प्रचारित-प्रसारित कर सकता है। ऐसे में हम इन माध्यमों का समझदारी पूर्वक प्रयोग करते हुए समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। इसी क्रम में वरिष्ठ पत्रकार महेश अग्रवाल ने पत्रकारिता एवं भाषा के संस्कार विषय पर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। संचालन डॉ. अजीत कुमार राय ने एवं आभार ज्ञापन डॉ. सुधीर कुमार चौबे ने किया।

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