मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका :  महादेवी वर्मा का साहित्य और आलोचकों के प्रश्न?

साहित्य शलाका :  महादेवी वर्मा का साहित्य और आलोचकों के प्रश्न?

भाग-अंतिम
डॉ. दयानंद तिवारी । जिस प्रकार हिमाच्छादित पर्वत से निकली किसी नदी का आदि वास्तविक उद्गम स्थल नहीं जाना जा सकता, उसी प्रकार साहित्य की किसी धारा का भी आदि उद्गम स्थल भी ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता। वास्तव में झरना के प्रकाशन के पश्चात ही छायावाद की जड़ हिंदी कविता के क्षेत्र में जमती है। मुकुटधर पांडे की रचनाएं छायावाद के निकट की हैं पर काव्य में व्यापक रूप से इस धारा का प्रवर्तन करनेवाले कवियों के रूप में प्रसाद, पंत और निराला का नाम लिया जाता है। प्रसाद जी की कविता में प्रेम तत्व की प्रधानता है, उनका स्थूल प्रेम निरंतर सूक्ष्म की ओर उन्मुख होता गया है और अंत में दार्शनिक चिंतन की भांति प्रकट हुए हैं। पंत की आरंभिक रचनाओं में कोमल हृदय का प्रकृति प्रधान प्रेम अभिव्यक्त हुआ। उनकी प्रारंभिक रचनाओं में नवगता बधू के सलज्ज शगुन के अवगुंठन का माधुर्य है। निराला की रचनाएं पौरुष संपन्न दर्शन का प्रतीक है। प्राय: सभी कवियों ने प्रगीतों की रचनाएं कीं और उनका अनोखापन सब में अलग-अलग दिखाई पड़ता है। यद्यपि इन कृतिकारों की प्रारंभिक रचना छायावाद के अंतर्गत रखी जाती है, तो भी उस समय और बाद में भी उन्होंने अनेक ऐसी सुंदर रचनाएं लिखीं जो केवल छायावाद से रचनाविधान तक ही संबंध रखती हैं, वास्तव में वह उन्मुक्त हृदय की पुकार हैं। इन तीनों भावशिल्पों के प्रगीतों में हृदय को झंकृत कर देने की क्षमता है। सब में प्रकृति प्रेम की व्यापक अभिव्यक्ति के लिए व्याकुलता है। पर तीनों में तात्विक भेद भी है। प्रसाद में मानवीय प्रेम की आकुलता, पंत में सुकुमार प्रकृति का मधुर सौंदर्य चित्रण तथा निराला में पौरुष की व्यापक अभिव्यक्ति, तीनों के मौलिक कृतित्व का परिचय देती हैं।
महादेवी बौद्ध दर्शन से प्रभावित थीं और बौद्ध दर्शन में जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला गया है। जिसके कारण उनकी कविताओं में मिलन की क्षणिकता है किंतु उस क्षण में संपूर्ण जीवन के उल्लास का प्रतिबिंब मिलता है।

‘कैसे कहती हो सपना है सखि
उस मूक मिलन की बात।’

हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘महादेवी विराट विश्व में व्याप्त इस क्षणिक उल्लास वेदना की महिमा की गायिका हैं।’
महादेवी का काव्य स्वानुभूति प्रधान है किंतु उसमें अभिव्यक्त वैयक्तिक भावना मात्र व्यष्टि तक सीमित न रहकर समष्टि तक पहुंचती है। उनका काव्य प्रेमवादी मूल्यों से निर्मित हुआ है। जहां करुणा की प्रधानता है। उन्होंने अपनी प्रेमानुभूति की अभिव्यक्ति के लिए गीतों को अपनाया है। क्योंकि वैयक्तिकता गीत की विशेषता है। किंतु गीतों की वैयक्तिकता में सामाजिकता की परिणति हो जाती है। गीत को सुननेवाले हर व्यक्ति को उसमें अपना भाव ही नजर आता है। उन्होंने अपने काव्य में मिलन से अधिक विरह को महत्व दिया है-

‘जान लो वह मिलन एकाकी विरह में है दुकेला’

‘उनके काव्य का केंद्रीय बिंब है विरह की अंधेरी रात में प्रेम का दीपक जलाए किसी अज्ञात प्रिय की प्रतीक्षा में बैठी विरहिणी।’
विरह से उत्पन्न स्त्री मानसिकता का सूक्ष्म चित्रण सूर ने भी गोपियों के माध्यम से किया है किंतु महादेवी ने भी स्वयं को वियोगिनी के रूप में चित्रित कर स्त्री मनोदशा का बड़ा ही सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत किया है। महादेवी वर्मा अनेक अंतर्दशाओं में भटकती हुई नजर आती हैं। कहीं तो मिलन की चाह है और कहीं वियोग से उत्पन्न वेदना में आनंद की अनुभूति जिसे वे बनाए रखना चाहती हैं। विरह के कारण जो जिंदगी में सूनापन छा जाता है। उस सूनेपन में भी महादेवी के भीतर कहीं भी निराशा का भाव नजर नहीं आता है।

‘अपने इस सूनेपन की, मैं हूं रानी मतवाली
प्राणों का दीप जलाकर करती रहती दिवाली।’

विरह कामनाओं को जन्म देता है। ये कामनाएं मिलन होने पर क्या-क्या घटित होगा, उसके सपने दिखाने लगती हैं। यदि प्रियतम आ जाते तो क्या-क्या घटित होता उसकी कल्पना करते हुए महादेवी कहती हैं-

‘हंस उठते पल में आद्र नयन
धुल जाता ओठों से विषाद,
छा जाता जीवन में वसंत
लुट जाता चिर संचित विराग ;
आंखें देतीं सर्वस्व वार !
जो तुम आ जाते एक बार।’

महादेवी के भीतर प्रिय से मिलने की जो इच्छा है उसमें अंतर्विरोध नजर आता है। कहीं तो उनकी कविताओं में मिलन की तीव्र इच्छा अभिव्यक्त हुई और कहीं वे मिलन की इच्छा को छोड़ विरह की वेदना में ही रहना स्वीकार करती हैं ‘मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूं’। और कहीं प्रिय के आने के भान से ही हर्ष और उल्लास के भाव उनके भीतर क्रीड़ाएं करने लगते हैं-

‘नयन श्रवणमय श्रवण नयनमय आज हो रही कैसी उलझन !
रोम-रोम में होता री सखि एक नया उर का सा स्पंदन!
पुलकों से भरे फूल बन गए
जितने प्राणों के छाले हैं।’

‘वेदना से इन्होंने अपना स्वाभाविक प्रेम व्यक्त किया है, उसी के साथ वह रहना चाहती हैं। उसके मिलन-सुख को भी वे कुछ नहीं गिनतीं।’

महादेवी जो अपने प्रणयी भावों की अभिव्यक्ति कर रहीं थीं और जो सपने सजा रही थीं, उनमें भारतीय स्त्रियों के सपनों का प्रतिबिंब मिलता है। प्रेम और प्रेम में विरह की पीड़ा का बोध स्त्री को अधिक सताता है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नैतिकता का बंधन स्त्री को स्वच्छंद प्रेम की अनुमति नहीं देता है। जब महादेवी कहती हैं कि ‘मैं पलकों में पाल रही हूं यह सपना सुकुमार किसी का’ तो इस सपने में स्त्री जाति की भावनाओं का प्रतिबिंब है।

प्रेम में विरह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे इतिहास द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। सीता का धरती में समा जाना और राधा का व्रज में रह जाना और उर्मिला का राज महल में अपने पति का विरह भोगना विरह के भाव का ही उद्घाटन है। विरह प्रेम की कसौटी होती है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर ही कुंदन सोना बनता है ठीक उसी प्रकार प्रेम विरह की राह से गुजरकर ही परिपक्व होता है। संयोग में जहां स्थिरता होती है वहीं वियोग में सक्रियता होती है। विरह में व्यापकता होती है। महादेवी के प्रेम में परिपक्वता है उसमें मिलन की इच्छा तो है किंतु छटपटाहट नहीं है और जीवन प्रति पूर्ण आस्था और विश्वास है-

‘तुम मानस में बस जाओ
छिप दुख की अवगुंठन से,
मैं तुम्हें ढूंढ़ने के निमित्त
परिचित हो लूं कण कण से।’
इस तरह छायावादी रचनाकारों के सामने अपना व्यक्तित्व था। उसी रास्ते पर जो सांस्कृतिक अधिक था, समाज को भी ले चलना चाहते थे पर सामाजिक जागृति संघबद्ध हो एक उद्देश्य के लिए, एक रास्ते पर चलना चाहती थी। क्योंकि यह बात जन मन में समा गई थी सारे अनर्थ का मूल परतंत्रता है, अतएव जनजीवन का तथा छायावादी कवियों का रास्ता विलग-विलग हो गया। यद्यपि आज तक जितनी नई रचनाओं का दर्शन होता है, उनमें प्राय: अधिकांश कुछ न कुछ छायावादी रचना विधान से प्रभावित है। छायावाद के प्रवर्तक कवि भी जहां तक भावना का प्रश्न है आज इन्हीं कारणों से किसी दूसरे रूप में दिख रहे हैं। उनके संबंध में अलग-अलग विचार करने की आवश्यकता है। यहां पर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि कई आलोचक, कई विचारक महादेवी वर्मा को छायावाद का आधार स्तंभ नहीं मानते। इस संदर्भ में मेरा अपना मत है कि महादेवी वर्मा की कविताओं में कहीं न कहीं छायावाद के स्वर तो जरूर हैं परंतु आलोचकों ने उसे अपने अपने ढंग से देखा है, उनके साहित्य की समीक्षा प्रस्तुत की है। यहां तक कि सुप्रसिद्ध आलोचक डॉक्टर वीर बहादुर सिंह का कहना है कि मेरे गुरु? जी डॉक्टर नंददुलारे वाजपेई महादेवी वर्मा को छायावाद में स्थान नहीं देते।
महादेवी वर्मा के काव्य को छायावादी काव्य में स्थान देने को लेकर हिंदी के शिखर आलोचकों में एकता नहीं बन पाई। कई शिखर आलोचकों ने उन्हें अपने-अपने ढंग से छायावाद से अलग करने का प्रयास किया है। यह एक बड़ा प्रश्न है। इस प्रश्न पर विचार होना चाहिए।

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