मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट : रामचरित जे सुनत अघाहीं, रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं

लिटरेचर प्वाइंट : रामचरित जे सुनत अघाहीं, रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं

रासबिहारी पांडेय। सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती संपूर्ण विश्व में मनाई जाती है। तुलसीदास रचित प्रमुख १२ ग्रंथ हैं, किंतु सारे ग्रंथ एक तरफ और श्री रामचरितमानस एक तरफ। उनकी प्रसिद्धि का मूल आधार श्री रामचरितमानस ही है।

श्री रामचरितमानस देश और काल की सीमाएं लांघ चुका है। दिन-प्रतिदिन उसकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है। गीता प्रेस द्वारा निरंतर उसका प्रकाशन और प्रतिदिन हजारों प्रतियों की बिक्री इसका प्रमाण है। विदेशी लेखकों में ग्रियर्सन, बुल्के और वारान्निकोव ने मानस के समान किसी भाषा में लिखित किसी ग्रंथ से उसकी समानता नहीं स्वीकार की। लोग श्री रामचरितमानस के दोहे और चौपाइयां अपनी बैठकों और अध्ययन कक्षों में अंकित कराते हैं। संपूर्ण विश्व में कहीं न कहीं श्री रामचरितमानस का अखंड पाठ चलता ही रहता है। हजारों कथावाचक श्री रामचरितमानस को आधार बनाकर श्रीराम कथा करते हुए जीविकोपार्जन करते हैं। कितने ही गायक/गायिकाओं की पहचान मानस के दोहे चौपाइयों और सुंदरकांड के पारायण की वजह से बनी।

‘प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवास दु:खत:’ राज्याभिषेक का समाचार पाकर वे न तो प्रसन्न हुए न ही बनवास के समय वे दुखी हुए। खासतौर से मानस के उत्तरकांड में जीवन के तमाम गूढ़ रहस्यों का समाधान विस्तार से वर्णित है। बहुत पहले एक संत ने मुझे एक घटना सुनाई थी। एक बार वे किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर बैठे हुए श्री रामचरितमानस का पाठ कर रहे थे। एक युवक भी अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ उनके पास ही ट्रेन का इंतजार कर रहा था। उसने मानस पढ़ते हुए देखकर उन पर व्यंग्य करते हुए कहा कि दुनिया में इतनी सारी किताबें लिखी गर्इं मगर आप अब तक मानस पर ही अटके हुए हैं। संत ने कहा कि मुझे तो इसमें नित नवीन रस मिलता है इसलिए पाठ करता हूं। थोड़ी ही देर में ट्रेन आई। भीड़ का सामना करते हुए युवक ने पहले अपने सामान को ट्रेन में रखा, फिर बच्चों को सीट तक पहुंचाया, इतने में ट्रेन खुल गई। तत्काल उसने ट्रेन की जंजीर खींच दी। पूछने पर बताया कि उसकी पत्नी प्लेटफॉर्म पर ही रह गई। तब संत ने कहा कि यदि तुमने श्री रामचरितमानस पढ़ा होता तो यह भूल कदापि न करते। गंगा पार करने के लिए केवट की नाव में जब चढ़ना हुआ तो प्रभु श्रीराम ने पहले सीता को चढ़ाया, फिर खुद चढ़े।

‘प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई’
युवक इस बात से शर्मिंदा हुआ और उसने संत से क्षमायाचना करते हुए मानस को हृदयंगम करने का संकल्प लिया।
‘रामचरित जे सुनत अघाहीं/रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं’। अर्थात राम कथा सुनते हुए जो लोग तृप्ति महसूस करते हैं उन्होंने उस विशेष रस को जाना ही नहीं, क्योंकि बुध विश्राम सकल जन रंजनि/ रामकथा कलि कलुष विभंजनि/रामकथा विद्वानों के मस्तिष्क के लिए विश्राम स्थल और जन समाज के चित्त को प्रमुदित करने वाली तथा कलियुग के पापों को मिटाने वाली है।

रचि महेस निज मानस राखा/पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा। लेकिन जब स्वयं उन्हें कथा सुनने का मन हुआ तो वे सती जी को साथ लेकर वैâलाश पर्वत छोड़कर अगस्त्य ऋषि के पास गए। याज्ञवल्क्य ऋषि ने भरद्वाज ऋषि से और पक्षीराज गरुड़ ने यह कथा कागभुसुंडी से सुनी। वरिष्ठ कथाकार भी नवोदित कथाकारों के मुख से श्रीराम कथा सुनते हैं। अगर आपने अब तक इस ग्रंथ का अध्ययन नहीं किया है तो समय निकालकर अति आवश्यक मानते हुए इसे जरूर पढ़ें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको अनुपम आनंद की अनुभूति होगी और आप स्वयं को पहले की तुलना में मानसिक रूप से विशेष समृद्ध अनुभव करेंगे।

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