मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट :  सांस्कृतिक प्रदूषण का वाहक ‘बिग बॉस’

लिटरेचर प्वाइंट :  सांस्कृतिक प्रदूषण का वाहक ‘बिग बॉस’

रासबिहारी पांडेय

हाल ही में १७वें सीजन के ‘बिग बॉस’ विजेता एल्विश यादव को २५ लाख रुपए दिए गए हैं। ‘बिग बॉस’ में क्या खेल होता है, जिससे लोगों का मनोरंजन होता है और इसके लिए प्रतिभागी को पुरस्कृत किया जाता है, यह मेरी समझ से बाहर है। स्वस्थ मनोरंजन करना तो सबके बस की बात नहीं लेकिन मानसिक विकृति और गलत संस्कारों को जन्म देनेवाले ऐसे सीरीज को बेरोक-टोक चलने देना भी सांस्कृतिक पुरोधाओं के लिए किसी अपराध से कम नहीं है। जिस महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन की अविरल धारा बही, जहां पारिवारिक जीवन की पवित्रता, मानवता की परंपरा को बल मिला, ज्ञानदेव, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ, रामदास जैसे संतों ने जहां प्रेम और विश्वास का पाठ पढाया उसी भूमि से पिछले १७ वर्षों से ‘बिग बॉस’ जैसे निरर्थक और अत्यंत आपत्तिजनक सीरीज का निर्माण और प्रदर्शन हो रहा है। बहुत योजनापूर्वक सिनेमा, सीरियल के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में नाम कमा चुकी लोकप्रिय हस्तियों को सम्मिलित कर इस शो में जनता की दिलचस्पी पैदा की जाती है। शामिल होनेवालों से पहले ही करार कर लिया जाता है कि उनका कितना भी छीछालेदर किया जाए, वे तय समय से पहले शो से बाहर न जाने के लिए बाध्य होंगे। इसके एवज में प्रति सप्ताह उन्हें अपने कद के अनुरूप एकमुश्त राशि का भुगतान किया जाता है, फिर उन्हीं प्रतिभागियों में विद्वेष पैदा करके उनकी कमियां गिनाकर उन्हें बाहर करने के लिए वोट कराया जाता है। सिर्फ यही नहीं प्रतिभागियों को गोबर के टब में नहाने, आधे बाल मुंड़ाने, कुत्ते के बाउल से पानी पीने, चेहरे पर मिर्च का पेस्ट लगाने, कीचड़ में कुश्ती करने जैसे बेहद घटिया और बेसिर पैर के टास्क दिए जाते हैं। सेलिब्रिटी होने के बावजूद और यह जानते हुए भी कि चारों तरफ वैâमरे लगे हैं और उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है, प्रतिभागी बदतमीजी और अश्लीलता की सारी हदें पार करते दिखते हैं। इस काजल की कोठरी में हर प्रतिभागी दागदार होता है, किंतु धन्य है इस शो के होस्ट सलमान खान, जो इनमें से भी एक को सर्वश्रेष्ठ चुन लेते हैं। सत्ता में रहनेवाली और सत्ता में आने की कोशिश में लगी राजनीतिक पार्टियों का ध्यान इस तरह के सांस्कृतिक प्रदूषणों के ऊपर कभी नहीं जाता। गांधी, नेहरू पर आधारित किसी नाटक या फिल्म में वैचारिक भिन्नता लिए कोई आपत्तिजनक दृश्य आ जाए तो धरना-प्रदर्शन होने लगते हैं, लेकिन अपनी सारी अश्लीलता और आपत्तिजनक दृश्यों के बावजूद ‘बिग बॉस’ जैसा शो नियमित रूप से तीन महीने से अधिक चलता रहता है और किसी के कान पर जूं नहीं रेंगता। सड़क पर कोई लावारिस लाश मिलती है तो उसकी पूरी तफ्तीश की जाती है, लेकिन जिंदा आदमी सलीके से जीता रहे, अपने स्वार्थ के वशीभूत कोई उसकी मानसिक कमजोरियों का दोहन न कर सके, क्या इसकी जिम्मेवारी समाज के ठेकेदारों पर नहीं है?
(लेखक वरिष्ठ कवि व साहित्यकार हैं।)

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