मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट : जातिगत सर्वेक्षण या चुनावी ध्रुवीकरण

लिटरेचर प्वाइंट : जातिगत सर्वेक्षण या चुनावी ध्रुवीकरण

रासबिहारी पांडेय

महात्मा गांधी जीवन भर जातीय और धार्मिक विद्वेष के खिलाफ लड़ते रहे, मगर उन्हीं की जयंती २ अक्टूबर को बिहार सरकार ने बिहार के जातिगत सर्वेक्षण का आंकड़ा जारी कर दिया। हालांकि, इसके आंकड़ों को लेकर लोगों में मतभेद है और इसकी सत्यता का पुख्ता प्रमाण मांगा जा रहा है, लेकिन इतना तय है कि इससे निकलने वाली चिंगारी समाज के हित में नहीं है। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाकर भारत में लगभग २०० वर्षों तक राज किया। पहला जातिगत सर्वेक्षण ब्रिटिश सरकार ने १८२१ में किया था और आखिरी बार १९३१ में। तब यह सर्वेक्षण पूरे देश में किया गया था। बिहार सरकार के अनुसार, वर्तमान सर्वेक्षण में ५०० करोड रुपए खर्च किए गए हैं। इस जाति सर्वेक्षण से समाज को क्या लाभ होगा, इसका कोई विज्ञापन अभी तक जारी नहीं किया गया है। संभव है आनेवाले दिनों में वह भी जारी कर दिया जाए!
बिहार के बहुत कम अस्पतालों में एमआरआई और एक्स-रे जैसे चिकित्सकीय उपकरण उपलब्ध हैं। अनेक विद्यालय जर्जर इमारतों में चल रहे हैं, जिसके कारण शिक्षकों और छात्रों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। शिक्षित बेरोजगारों के मामले में भी बिहार नंबर वन पर है। शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार के प्राथमिक मुद्दे को छोड़कर जातीय जनगणना में इतना बड़ा बजट खर्च करने की क्या जल्दबाजी थी, यह बताने की जरूरत नहीं है। २०२४ के चुनाव के मद्देनजर सरकार जातीय जनगणना का हवाला देकर वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है।
स्वयं से नीचा दिखाने के लिए हर जाति के पास उससे नीची जाति है। समाज में जाति की इतनी गहरी जड़ें हैं कि इनका उन्मूलन करना असंभव है। सौमनस्यता और वैचारिकता के आधार पर ही जातिगत राग द्वेष को खत्म किया जा सकता है। समाज में वर्ण का विभाजन व्यक्ति के काम के आधार पर था, जो जिस वर्ण का काम करेगा उसका वर्ण वही माना जाएगा। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- चातुर्वर्ण्यं मया स्रष्टं गुणकर्मविभागश: अर्थात् गुण और कर्म के अनुसार, ये चारों वर्ण मेरे द्वारा रचित हैं। हजारों साल तक वर्ण व्यवस्था इसी आधार पर चली। पहले जाति का आधार उसका काम था। आज हर जाति के लोग हर जाति का काम कर रहे हैं। तकनीक ने आज पूरी दुनिया को जोड़ दिया है। मिस्र और यूरोप के देशों में सभ्यता के विकास के साथ जाति व्यवस्था ने दम तोड़ दिया, लेकिन भारत में पता नहीं वह सुदिन कब आएगा? आज भी अंतरजातीय विवाह को खुले मन से नहीं स्वीकार किया जाता। गांव में तो जात बाहर करने का भी चलन है। ऑनर किलिंग जाति प्रथा की ही देन है। दुनिया के सभी विचारकों, दार्शनिकों ने माना है कि जाति व्यवस्था एक सामाजिक बुराई है। हम तब तक एक प्रौढ़ समाज की कल्पना नहीं कर सकते जब तक जाति के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था संचालित होती रहेगी। संविधान में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव की सख्त मनाही है। देश को स्वतंत्र हुए ७६ वर्ष बीत चुके हैं लेकिन जातिगत ध्रुवीकरण आज भी चरम पर है। साहित्य ने जातीय राग द्वेष का निषेध किया है- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान! साहित्य का अंतिम लक्ष्य है सामाजिक समरसता और मानवता की स्थापना, जबकि राजनीति का अंतिम लक्ष्य है सत्ता की प्राप्ति। काश, जनता इन बातों को समझ पाती और इन सियासी लोगों के छलावे में न आती!
(लेखक वरिष्ठ कवि व साहित्यकार हैं।)

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